जनसुरक्षा, जलस्रोत, खेती और पर्यावरण को लेकर जताई गंभीर चिंता, अधिवक्ताओं ने कहा– स्थानीय आबादी के भविष्य की अनदेखी कर नहीं थोपी जाए परमाणु परियोजना
सिरमौर (रीवा)। रोझौही-क्यौटी क्षेत्र में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र को लेकर उठ रहा विरोध अब ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों के दायरे से आगे बढ़कर अधिवक्ता समुदाय तक पहुंच गया है। परियोजना के विरोध में सिरमौर तहसील के अधिवक्ताओं ने एकजुट होकर शासन के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। बुधवार शाम अधिवक्ताओं के प्रतिनिधिमंडल ने एसडीएम के माध्यम से प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन प्रेषित कर प्रस्तावित परमाणु संयंत्र की स्थापना पर पुनर्विचार करने, परियोजना निरस्त करने अथवा इसे किसी दूसरे उपयुक्त स्थान पर स्थानांतरित करने की मांग उठाई।अधिवक्ताओं का कहना है कि किसी भी बड़े औद्योगिक अथवा ऊर्जा प्रकल्प की स्थापना से पहले उस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरणीय संवेदनशीलता का गंभीरता से आकलन किया जाना आवश्यक है। रोझौही और क्यौटी का क्षेत्र कृषि, प्राकृतिक जलस्रोतों और स्थानीय आबादी से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यहां परमाणु ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने की योजना को लेकर अनेक सवाल खड़े हो रहे हैं।
जनजीवन और प्राकृतिक संसाधनों पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंता
प्रधानमंत्री के नाम भेजे गए ज्ञापन में अधिवक्ताओं ने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय हादसों का उल्लेख करते हुए चेरनोबिल, फुकुशिमा और थ्री माइल आइलैंड जैसी घटनाओं का हवाला दिया। उनका तर्क है कि परमाणु परियोजनाओं से जुड़े जोखिमों को केवल तकनीकी दावों के आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्थानीय आबादी की सुरक्षा, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।ज्ञापन में यह भी सवाल उठाया गया कि परमाणु रिएक्टरों के संचालन और शीतलन के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। ऐसे में विंध्य क्षेत्र के जल संसाधनों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इस संबंध में स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। अधिवक्ताओं ने खेती-किसानी, पेयजल की उपलब्धता और आसपास के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को भी महत्वपूर्ण मुद्दा बताया।
क्यौटी जलप्रपात और क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत का भी उठाया मुद्दा
अधिवक्ताओं ने क्यौटी जलप्रपात सहित आसपास के प्राकृतिक स्थलों और जैव विविधता को लेकर भी चिंता जाहिर की। उनका कहना है कि विंध्य क्षेत्र की पहचान केवल खनिज संपदा और औद्योगिक संभावनाओं से नहीं, बल्कि यहां की प्राकृतिक विरासत, कृषि भूमि और जलस्रोतों से भी है। विकास की किसी भी योजना में इन संसाधनों के संरक्षण को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
सौर ऊर्जा के विकल्प पर भी दिया जोर
ज्ञापन में रीवा की सौर ऊर्जा परियोजना का उदाहरण देते हुए अधिवक्ताओं ने कहा कि क्षेत्र पहले ही सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अपनी पहचान स्थापित कर चुका है। ऐसे में ऊर्जा उत्पादन के लिए सौर और पवन ऊर्जा जैसे वैकल्पिक माध्यमों की संभावनाओं पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि ऊर्जा की जरूरतों और स्थानीय आबादी के हितों के बीच संतुलन स्थापित करना जरूरी है।
जनसुनवाई और पर्यावरणीय रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग
अधिवक्ताओं ने प्रस्तावित परियोजना से प्रभावित गांवों में पारदर्शी और निष्पक्ष जनसुनवाई कराने की मांग की है। साथ ही स्वतंत्र विशेषज्ञों के माध्यम से पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन कराकर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर जोर दिया है, ताकि स्थानीय नागरिकों को परियोजना से जुड़े संभावित लाभ, जोखिम और वास्तविक परिस्थितियों की जानकारी मिल सके। अधिवक्ताओं का मानना है कि प्रभावित क्षेत्र के लोगों की राय और आपत्तियों को निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान मिलना चाहिए।
कानूनी लड़ाई से लेकर जनआंदोलन तक आगे बढ़ने के संकेत
ज्ञापन सौंपने वाले अधिवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह विषय केवल किसी एक गांव या सीमित आबादी का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य, पर्यावरण और जनसुरक्षा से जुड़ा है। यदि उनकी मांगों पर शासन स्तर से गंभीरता नहीं दिखाई गई तो वे इस मामले को कानूनी स्तर पर आगे बढ़ाने के साथ स्थानीय नागरिकों के साथ मिलकर आंदोलन में भी भागीदारी करेंगे।इस दौरान अधिवक्ता सतीश मिश्रा, राजीव त्रिपाठी, शिवम सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह, अनिल सिंह, आशुतोष विश्वकर्मा, अवधेश गर्ग और सौरभ शुक्ला सहित अन्य अधिवक्ता मौजूद रहे।
रोझौही-क्यौटी परियोजना को लेकर लगातार सामने आ रही आपत्तियों के बीच अधिवक्ता समुदाय की इस पहल ने साफ संकेत दिया है कि अब परियोजना का सवाल केवल स्थानीय विरोध तक सीमित नहीं रह गया है। जनसुरक्षा, पर्यावरणीय पारदर्शिता और स्थानीय लोगों की सहमति जैसे मुद्दों पर शासन को अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा।
