बधाई हो! आपने जैसा नेता चुना, वैसी ही सड़क मिली… अब गड्ढों पर शिकायत कैसी?

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रविवार विशेष | जनहित में – देवेन्द्र सक्सैना 

अजमेर| सबसे पहले शहर की जागरूक जनता को बधाई।

आपने वर्षों तक नारे लगाए, जुलूस निकाले, जाति देखी, पार्टी देखी, चेहरे देखे, फोटो खिंचवाई, फूल-मालाएं पहनाईं और फिर वोट देकर ऐसे जनप्रतिनिधि चुने, जो आज वही कर रहे हैं जिसके लिए आपने उन्हें चुना था। अब यदि बरसात में सड़क बन रही है और पहली ही बारिश में उसका भविष्य भी बह रहा है, तो इसमें आश्चर्य कैसा?

आखिर विकास दिखाई भी तो देना चाहिए। बरसात में सड़क बनेगी, कुछ दिन बाद गड्ढे बनेंगे, फिर गड्ढों की मरम्मत होगी, फिर नया टेंडर निकलेगा, फिर नया उद्घाटन होगा, फिर नई फोटो आएगी और फिर अगले चुनाव तक “विकास” चलता रहेगा। इसे ही शायद विकास का रीचार्ज प्लान कहते हैं।

तकनीकी विशेषज्ञ वर्षों से बताते रहे हैं कि लगातार बारिश के दौरान सड़क निर्माण गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। लेकिन तकनीक से चुनाव नहीं जीते जाते, फोटो और फीते से जीते जाते हैं। इसलिए सड़क मजबूत हो या न हो, उद्घाटन मजबूत होना चाहिए।

शहर में एक नई परंपरा भी शुरू हो चुकी है। अब नाली का उद्घाटन भी ऐसे होता है, मानो कोई अंतरराष्ट्रीय परियोजना पूरी हो गई हो। स्ट्रीट लाइट जलने से पहले कैमरे की फ्लैश जरूर जलती है। कभी-कभी लगता है कि निर्माण कार्य जनता के लिए कम और सोशल मीडिया पोस्ट के लिए अधिक हो रहे हैं।

फिर जनता भी कम समझदार नहीं है। पांच साल तक चुप रहती है, चुनाव आते ही फिर वही चेहरे, वही वादे, वही नारों पर ताली बजा देती है। और चुनाव के छह महीने बाद सोशल मीडिया पर लिखती है—“ये सड़क किसने बनाई?”

सवाल सड़क का नहीं, सोच का है।

जब वोट देते समय योग्यता से ज्यादा जाति, समाज, पार्टी, व्यक्तिगत संबंध और क्षणिक लाभ को महत्व मिलेगा, तब परिणाम भी वैसा ही मिलेगा। लोकतंत्र में नेता आसमान से नहीं उतरते, वे जनता की पसंद से आते हैं।

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अब बात उन इंजीनियरों की…

जो वर्षों से एक ही शहर, एक ही विभाग और लगभग एक जैसी शिकायतों के बीच भी “अनुभव” का तमगा लेकर व्यवस्था का हिस्सा बने हुए हैं।

कहते हैं कि इंजीनियर देश बनाते हैं। लेकिन जनता पूछ रही है—अजमेर में आखिर बन क्या रहा है? सड़कें हर साल नई, गड्ढे उससे भी नए, नाले अधूरे, जलभराव स्थायी और फाइलों में विकास हमेशा “प्रगति पर”।

आखिर ऐसा कैसे होता है कि बरसों से एक ही विभाग में बैठे अधिकारी और इंजीनियर बदलते नहीं, लेकिन हर मानसून में शिकायतें वही रहती हैं? यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी सड़कें पहली बारिश में जवाब दे दें, तो केवल मौसम को दोष देकर जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। जनता को यह जानने का अधिकार है कि गुणवत्ता की जांच किसने की, निर्माण मानकों का पालन किसने सुनिश्चित किया और यदि कहीं कमी रही तो उसकी जवाबदेही किसकी तय हुई।

सरकारी इंजीनियर किसी ठेकेदार के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि जनता के धन के संरक्षक होते हैं। उनकी पहली निष्ठा संविधान, नियमों और तकनीकी मानकों के प्रति होनी चाहिए। यदि मानकों से समझौता होगा, तो उसका नुकसान केवल सड़क का नहीं, जनता के विश्वास का भी होगा।

आज जरूरत इस बात की है कि जनता केवल नेताओं से ही नहीं, तकनीकी अधिकारियों से भी सवाल पूछे। विकास का अर्थ केवल शिलान्यास और उद्घाटन नहीं, बल्कि वर्षों तक टिकने वाला निर्माण है।

अब एक छोटा-सा प्रयोग कीजिए।

अगली बार कोई नेता आपके मोहल्ले में आए तो उससे यह मत पूछिए कि उद्घाटन कब होगा। उससे पूछिए—

बरसात में सड़क क्यों बन रही है?

कितने साल की गारंटी है?

अगर छह महीने में सड़क टूट गई तो जिम्मेदार कौन होगा?

काम की गुणवत्ता की जांच किसने की?

तकनीकी स्वीकृति किस आधार पर दी गई?

और सबसे महत्वपूर्ण…

जो व्यक्ति आज गलत कामों पर सवाल उठा रहा है, क्या आपने कभी उसका साथ दिया? या केवल उसे “विरोध करने वाला” कहकर किनारे कर दिय

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लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जनता पहले गलत प्राथमिकताओं के आधार पर नेताओं को चुनती है और बाद में उन्हीं से आदर्श शासन की उम्मीद करती है।

याद रखिए, सरकारी खजाना किसी नेता, अधिकारी या ठेकेदार की निजी तिजोरी नहीं है। यह आपके टैक्स, आपकी मेहनत और देश की संपत्ति है। इसका एक-एक रुपया टिकाऊ विकास पर खर्च होना चाहिए, न कि हर बरसात में बह जाने वाली सड़कों पर।

इसलिए अगली बार वोट देने से पहले मंच पर भाषण नहीं, मैदान में काम देखिए। पोस्टर नहीं, परियोजना देखिए। मालाएं नहीं, गुणवत्ता देखिए। और सबसे बढ़कर यह देखिए कि कौन आपकी सुविधा के लिए आवाज उठा रहा है और कौन केवल कैमरे के लिए खड़ा है।

क्योंकि…

गड्ढे सड़क में बनने से पहले अक्सर हमारी सोच में बनते हैं।

और लोकतंत्र का सबसे बड़ा इंजीनियर जनता का वोट ही होता है।

जिस दिन जनता अपने वोट की गुणवत्ता सुधार लेगी, उसी दिन सड़कों की गुणवत्ता भी सुधर जाएगी। उस दिन शायद हर बरसात के बाद गड्ढों की नहीं, अच्छे विकास की चर्चा होगी।

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