अजमेर । अजमेर के क्रिश्चियनगंज स्थित चर्च हॉल के पास हुई दुर्घटना जिसमें एक स्कॉर्पियो ने सड़क पर खड़ी कार को पीछे से टक्कर मार दी ,टक्कर लगने से आगे खड़ी कारों को भी नुकसान हुआ । हालांकि इस दुर्घटना में कोई जनहानि नहीं हुई । अब इसे अगर सिर्फ “एक एक्सीडेंट” कहकर टाल दिया जाए, तो यह सच्चाई से भागना होगा। दरअसल, यह हादसा नहीं—बल्कि उस सिस्टम का आईना है, जो वर्षों से आंखें मूंदे बैठा है।
शहर की सड़कों का हाल किसी से छुपा नहीं है। जहां जगह मिली, वहीं गाड़ी खड़ी कर दी। सड़कें अब चलने के लिए कम और वाहन खड़े करने के लिए ज्यादा इस्तेमाल हो रही हैं। सवाल यह है कि यह स्थिति बनी कैसे? और उससे भी बड़ा सवाल—इसे बनने किसने दिया?
प्रशासन हर दिन इन सड़कों से गुजरता है। ट्रैफिक पुलिस भी देखती है, नगर निगम चुप्पी साधे है, लेकिन कार्रवाई? शायद फाइलों में कहीं दबकर रह जाती है। नियम हैं, लेकिन उनका पालन कराने की इच्छाशक्ति कहीं नजर नहीं आती।
जब सड़कों पर अवैध पार्किंग आम हो जाए, तो हादसे असामान्य नहीं रहते—वे तय हो जाते हैं। ऐसे में अगर कोई वाहन आकर टक्कर मार देता है, तो क्या पूरी जिम्मेदारी उसी ड्राइवर की है? या फिर उन हालात की भी, जो इस टक्कर की वजह बने?
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जिम्मेदार हर बार आसान रास्ता चुन लेते हैं—ड्राइवर को दोषी ठहरा दो, मामला दर्ज कर दो, और कहानी खत्म। लेकिन असल सवाल वहीं का वहीं रह जाता है। अगर सड़क का आधा हिस्सा पहले से ही पार्किंग में घिरा हो, तो क्या वह सड़क सुरक्षित कही जा सकती है?
यह सिर्फ एक इलाके की समस्या नहीं है। पूरा अजमेर इसी बीमारी से जूझ रहा है। गली-मोहल्लों से लेकर मुख्य मार्गों तक, हर जगह वही हाल है। और यह सब बिना प्रशासन की जानकारी के हो रहा है, यह मानना मुश्किल है।
सच तो यह है कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि एक तरह की चुप सहमति है। जब नियम तोड़ने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो वे इसे अपनी “आज़ादी” समझ लेते हैं। और यही आज़ादी धीरे-धीरे अराजकता में बदल जाती है।
अब सवाल यह है कि इस मामले का अंजाम क्या होगा? क्या यह भी आपसी समझौते में खत्म हो जाएगा? या फिर प्रशासन इस बार कुछ अलग करेगा? क्या अवैध पार्किंग करने वालों पर भी कार्रवाई होगी, या फिर सारा बोझ सिर्फ एक ड्राइवर पर डाल दिया जाएगा?
अजमेर को स्मार्ट सिटी बनाने की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन स्मार्ट सिटी की पहली शर्त है—व्यवस्थित यातायात और नियमों का सख्ती से पालन। अगर सड़कें ही पार्किंग में बदल जाएं, तो स्मार्ट सिटी का सपना सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।
अंत में बात सीधी है—
हादसे सड़क पर नहीं होते, वे सिस्टम की कमजोरी से जन्म लेते हैं।
जब तक यह सिस्टम जागेगा नहीं, तब तक हर टक्कर एक नई खबर बनेगी, और हर खबर में वही पुराना सवाल गूंजेगा—
आखिर जिम्मेदार कौन?

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