315वें RTI वेबिनार में उठे जवाबदेही और पारदर्शिता के मुद्दे, सूचना आयोगों में लंबित मामलों व कार्यकर्ताओं की सुरक्षा पर जताई चिंता

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अजमेर/ रीवा (मध्य प्रदेश)। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम को लोकतांत्रिक जवाबदेही का सबसे प्रभावी माध्यम बताते हुए आयोजित 315वें आरटीआई एवं कानूनी वेबिनार में विशेषज्ञों ने सूचना आयोगों में बढ़ते लंबित मामलों, आरटीआई कार्यकर्ताओं की सुरक्षा, पारदर्शिता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की। “आरटीआई एंड डेमोक्रेटिक अकाउंटेबिलिटी” विषय पर आयोजित इस वेबिनार में आरटीआई रिसोर्स पर्सन वीरेंद्रकुमार ठक्कर, मध्य प्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह तथा कानूनी विशेषज्ञ आत्मदीप सहित विभिन्न राज्यों के आरटीआई कार्यकर्ता और विधि विशेषज्ञ शामिल हुए।
मुख्य वक्ता वीरेंद्रकुमार ठक्कर ने कहा कि सूचना का अधिकार केवल एक वैधानिक कानून नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए), अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 से जुड़ा मौलिक अधिकार है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1996 में जन आंदोलनों से शुरू हुई यह पहल अक्टूबर 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम के रूप में लागू हुई, जिसने शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत किया।
उन्होंने बताया कि आरटीआई तीन प्रमुख आधारों पर कार्य करता है—धारा 4 के तहत सरकारी विभागों द्वारा स्वतः सूचना का प्रकटीकरण, नागरिकों को आवेदन पर निर्धारित समय में सूचना उपलब्ध कराना तथा सूचना नहीं देने पर अपील और दंड की व्यवस्था।

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वेबिनार में विशेषज्ञों ने सूचना आयोगों में बढ़ते बैकलॉग, आयुक्तों के रिक्त पदों के कारण लंबित मामलों, आरटीआई कार्यकर्ताओं के खिलाफ बढ़ती धमकियों तथा गोपनीयता और जनहित के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर चिंता व्यक्त की। साथ ही कुछ राज्यों में लोक सूचना अधिकारियों द्वारा सूचना देने में अनावश्यक देरी और मनमाने रवैये की भी आलोचना की गई।
चर्चा के दौरान नए श्रम कानूनों और कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) से जुड़े मुद्दों पर भी विचार-विमर्श हुआ। वक्ताओं ने कहा कि श्रम कानूनों के एकीकरण के बाद बड़ी संख्या में कामगारों को इसका दायरा मिला है। भविष्य निधि कटौती से जुड़े विवादों की स्थिति में श्रम न्यायालय तथा आरटीआई जैसे कानूनी उपाय अपनाने की सलाह दी गई।
वेबिनार में विभिन्न राज्यों से आए मामलों पर विशेषज्ञों ने अलग-अलग कानूनी सुझाव भी दिए। इनमें पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की विशिष्ट रिपोर्टों के आधार पर आरटीआई लगाने, महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मामलों में राष्ट्रीय महिला आयोग में शिकायत दर्ज कराने, बिजली चोरी के मामलों में नियमानुसार अपील करने, सूचना आयोगों के विवादित नियमों को उच्च न्यायालय में चुनौती देने, सीएम हेल्पलाइन शिकायतों के निस्तारण की जानकारी आरटीआई से प्राप्त करने, प्रथम अपील में देरी होने पर दूसरी अपील दायर करने तथा पर्यावरणीय उल्लंघनों के मामलों में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) का दरवाजा खटखटाने की सलाह शामिल रही।
समापन सत्र में कानूनी विशेषज्ञ आत्मदीप ने कहा कि केवल शिकायत दर्ज कराने के बजाय अपील प्रक्रिया का अधिक प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रतिभागियों से आग्रह किया कि सूचना प्राप्त करने के लिए आरटीआई के साथ-साथ अन्य उपलब्ध कानूनी उपायों का भी उपयोग करें।
वेबिनार के अंत में सभी प्रतिभागियों ने लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए ऐसे जागरूकता कार्यक्रमों में आम नागरिकों की अधिक से अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने पर सहमति व्यक्त की।

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