रोझौही न्यूक्लियर प्लांट के खिलाफ क्योटी में जनआक्रोश तेज, 14वें दिन भी धरने पर डटे ग्रामीण; बोले—मांग पूरी हुए बिना नहीं हटेंगे

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खेती-किसानी का व्यस्त मौसम और त्योहारों की तैयारियां भी नहीं डिगा सकीं आंदोलनकारियों का हौसला, अब भोपाल से दिल्ली तक आवाज पहुंचाने की तैयारी; विष्णुकान्त कुशवाहा ने राहुल गांधी से हस्तक्षेप की अपील की

रीवा। विकास की बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बीच जब किसी गांव के सामने अपनी जमीन, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल खड़ा हो जाए, तो विरोध केवल नारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि धीरे-धीरे जनआंदोलन का रूप लेने लगता है। रीवा जिले के प्रस्तावित रोझौही न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर इन दिनों ऐसा ही माहौल देखने को मिल रहा है। परियोजना के विरोध में क्योटी में ग्रामीणों का धरना लगातार जारी है। आंदोलन बुधवार को 14वें दिन में प्रवेश कर गया। खेती-किसानी के बेहद महत्वपूर्ण समय में भी आसपास के गांवों के महिला-पुरुष बड़ी संख्या में धरना स्थल पर पहुंचकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।आंदोलनकारियों के लिए यह महज किसी औद्योगिक परियोजना का विरोध नहीं, बल्कि जमीन, जल, पर्यावरण, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा सवाल बन गया है। धरना स्थल से उठ रही आवाज में अब थकान से ज्यादा दृढ़ता दिखाई दे रही है। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी चिंताओं और आपत्तियों का संतोषजनक समाधान किए बिना परियोजना को आगे बढ़ाना उनके हितों की अनदेखी होगी।

14 दिन से जारी धरना, आंदोलनकारियों का दो टूक संदेश—फैसला होने तक संघर्ष

आंदोलन की अगुवाई कर रहे विष्णुकान्त कुशवाहा ने पत्रकारों से चर्चा के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक शासन-प्रशासन प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट को निरस्त करने का निर्णय नहीं लेता, तब तक धरना समाप्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि खेती-किसानी का यह समय ग्रामीण परिवारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद लोग अपने खेतों और दूसरे जरूरी कामों से समय निकालकर आंदोलन में शामिल हो रहे हैं।उनके मुताबिक, आसपास के गांवों से रोजाना सैकड़ों ग्रामीण धरना स्थल पर पहुंच रहे हैं। कुशवाहा ने कहा कि इस लड़ाई को किसी एक व्यक्ति या संगठन की लड़ाई समझना गलत होगा। यह उन परिवारों की चिंता है, जिनकी जिंदगी जमीन, खेती और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी हुई है।

त्योहार मनाने की नसीहत पर आंदोलनकारियों का सवाल—भविष्य की चिंता का जवाब कौन देगा?

विष्णुकान्त कुशवाहा ने प्रशासनिक अधिकारियों के धरना स्थल पर पहुंचने और आंदोलन समाप्त करने की अपील किए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि ग्रामीणों को त्योहारों का हवाला देकर धरना समाप्त करने के लिए समझाया जा रहा है। लेकिन आंदोलनकारियों का सवाल है कि जब उनके मन में भविष्य और स्वास्थ्य को लेकर गंभीर आशंकाएं हैं, तब केवल त्योहारों का हवाला देकर उनकी चिंताओं को कैसे समाप्त किया जा सकता है?उन्होंने परमाणु परियोजना से संभावित स्वास्थ्य प्रभावों, विशेषकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की आशंकाओं का जिक्र करते हुए कहा कि ग्रामीण अपने परिवारों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। आंदोलनकारियों की मांग है कि परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी सभी सवालों का पारदर्शी एवं विश्वसनीय जवाब सार्वजनिक किया जाए।

अब गांव की चौखट से निकलकर भोपाल और दिल्ली तक पहुंचेगी आवाज

आंदोलनकारियों ने संकेत दिया है कि यदि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो संघर्ष का दायरा और व्यापक किया जाएगा। विष्णुकान्त कुशवाहा ने कहा कि जरूरत पड़ी तो ग्रामीणों की आवाज भोपाल से लेकर दिल्ली तक पहुंचाई जाएगी। उन्होंने कांग्रेस नेता एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से भी इस मामले में हस्तक्षेप करने और ग्रामीणों की आवाज उठाने की अपील की।इस बयान के बाद आंदोलन को व्यापक राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर उठाने की मंशा भी सामने आई है। आंदोलनकारी अब स्थानीय स्तर पर अपनी बात रखने तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि इस मुद्दे को प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की तैयारी में हैं।

धरना स्थल से उठता बड़ा सवाल—विकास किसके लिए और किसकी कीमत पर?

रोझौही न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर जारी विरोध ने एक बार फिर विकास परियोजनाओं और स्थानीय जनसहमति के बीच संतुलन का सवाल खड़ा कर दिया है। ऊर्जा उत्पादन और औद्योगिक निवेश अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन जिन गांवों की जमीन, प्राकृतिक संसाधन और सामाजिक जीवन इस तरह की परियोजनाओं से प्रभावित होने की आशंका है, उनकी चिंताओं को सुनना भी उतना ही जरूरी है।ग्रामीणों की मांग है कि उनकी आपत्तियों, स्वास्थ्य संबंधी आशंकाओं, पर्यावरणीय प्रभावों और जमीन से जुड़े सवालों पर स्पष्ट जवाब दिया जाए। धरना स्थल पर मौजूद ग्रामीणों ने परियोजना के विरोध में नारेबाजी करते हुए दो टूक कहा कि वे अपनी कृषि भूमि पर किसी भी कीमत पर न्यूक्लियर प्लांट स्वीकार नहीं करेंगे। 14 दिन बीत चुके हैं, लेकिन आंदोलनकारियों के तेवर में नरमी के संकेत नहीं दिख रहे। अब निगाहें शासन-प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। रोझौही का यह आंदोलन केवल एक परियोजना के विरोध तक सीमित रहेगा या आने वाले दिनों में प्रदेश की बड़ी जनबहस का विषय बनेगा, यह आने वाला समय तय करेगा। फिलहाल ग्रामीणों का संदेश साफ है—उनकी मांगों का समाधान हुए बिना आंदोलन थमने वाला नहीं है।

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