एक आध्यात्मिक कथा : आत्मबोध, अंतरात्मा और जीवन परिवर्तन की यात्रा – सचिन शर्मा,अजमेर।
एक नगर में एक व्यक्ति रहता था। वह प्रतिदिन मंदिर जाता, पूजा-पाठ करता, धर्म की बातें करता और संसार को उपदेश देता कि मनुष्य को सदैव धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए। समाज में उसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। लोग उसे धर्मात्मा कहते थे। लेकिन उसके भीतर एक ऐसा संघर्ष चल रहा था, जिसे वह स्वयं भी स्वीकार नहीं करना चाहता था।
वह दूसरों के दुख देखकर व्यथित तो होता, लेकिन सहायता करने के लिए आगे नहीं आता। अन्याय होते देखता, लेकिन समाज क्या कहेगा, इस डर से मौन रहता। किसी का अधिकार छीना जाता तो मन ही मन दुखी होता, लेकिन अपने संबंधों और प्रतिष्ठा के मोह में आवाज नहीं उठाता।
एक दिन वह एक संत के पास पहुंचा और बोला, “महाराज! मैं पूजा करता हूं, धर्म का पालन करता हूं, किसी का बुरा नहीं चाहता, फिर भी मेरे जीवन में शांति क्यों नहीं है? मेरे भीतर परिवर्तन क्यों नहीं आता?”
संत मुस्कराए और बोले, “तुम्हें धर्म का ज्ञान तो है, लेकिन क्या तुमने कभी अपने कर्मों को धर्म की कसौटी पर परखा है?”
व्यक्ति मौन हो गया।
संत ने आगे कहा, “जीवन केवल पूजा करने से नहीं बदलता। जीवन तब बदलता है, जब मनुष्य अपने कर्मों की जिम्मेदारी स्वीकार करता है। जब वह सही और गलत के बीच अंतर करने का साहस जुटाता है। जब वह उस शर्म को त्याग देता है, जो उसे सत्य बोलने, अन्याय का विरोध करने और अपनी गलतियों को स्वीकार करने से रोकती है।”
व्यक्ति ने आश्चर्य से पूछा, “क्या धर्म और शर्म को भी छोड़ना पड़ता है?”
संत ने उत्तर दिया, “नहीं वत्स! धर्म को नहीं, धर्म के नाम पर बने आडंबर को छोड़ना पड़ता है। मर्यादा को नहीं, झूठी लोकलाज को छोड़ना पड़ता है। कर्म को नहीं, स्वार्थ से भरे कर्मों को छोड़ना पड़ता है।”
फिर संत ने एक दीपक जलाया और कहा, “इस दीपक को देखो। यह स्वयं जलता है, तभी दूसरों को प्रकाश देता है। मनुष्य भी जब तक अपने भीतर के अहंकार, भय, स्वार्थ और दिखावे को नहीं जलाएगा, तब तक उसके जीवन में ज्ञान का प्रकाश कैसे आएगा?”
उस दिन उस व्यक्ति को पहली बार समझ आया कि धर्म केवल मंदिर की चौखट तक सीमित नहीं है। किसी भूखे को भोजन देना, किसी पीड़ित के साथ खड़ा होना, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना, अपनी भूल स्वीकार करना और सत्य के लिए अपनों के सामने भी खड़े होना ही वास्तविक धर्म है।
उसने उसी दिन से स्वयं को बदलना शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे उसकी पहचान पूजा-पाठ करने वाले व्यक्ति से नहीं, बल्कि दूसरों के दुख में काम आने वाले इंसान के रूप में होने लगी।
धर्म कभी मनुष्य को कायर नहीं बनाता। धर्म तो सत्य के साथ खड़े होने की शक्ति देता है। शर्म यदि किसी गलत कार्य को रोकती है तो वह मर्यादा है, लेकिन यदि वही शर्म सत्य बोलने से रोकती है तो वह बंधन है।
इसलिए जीवन में कभी-कभी कर्म, धर्म और शर्म की परिभाषाओं को नए सिरे से समझना पड़ता है।
क्योंकि ईश्वर भी उसी का मार्ग प्रशस्त करता है, जो केवल प्रार्थना में हाथ नहीं जोड़ता, बल्कि अपने कर्मों से संसार में प्रकाश फैलाने का प्रयास करता है।
अंततः जीवन बदलने के लिए संसार को बदलने की प्रतीक्षा मत करो। अपने भीतर परिवर्तन का पहला दीपक स्वयं जलाओ।
