✍️ संपादकीय | खबर वन न्यूज
अजमेर केवल एक शहर नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और संस्कृति की जीवंत पहचान है। लेकिन आज यह शहर एक ऐसे प्रशासनिक द्वंद्व का सामना कर रहा है, जिस पर गंभीर मंथन की आवश्यकता है। बरसात सिर पर है, अनेक क्षेत्रों में नालों की सफाई अधूरी है, अतिक्रमण लगातार बढ़ रहे हैं, अवैध निर्माणों की शिकायतें लंबित हैं और नागरिक अपने ही शहर की बुनियादी व्यवस्थाओं को लेकर चिंतित हैं।
सामान्य धारणा यही बनती है कि अधिकारी काम नहीं कर रहे। किंतु वास्तविकता शायद इससे कहीं अधिक जटिल है।
नगर निगम के एक कनिष्ठ अभियंता से हुई चर्चा ने प्रशासनिक व्यवस्था का एक ऐसा पक्ष सामने रखा, जिस पर सरकार और नीति-निर्माताओं को गंभीरता से विचार करना चाहिए। उनके अनुसार निगम के अभियंताओं और तकनीकी अधिकारियों की ड्यूटी लंबे समय से विभिन्न सरकारी शिविरों, अभियानों, योजनाओं और प्रोटोकॉल संबंधी कार्यों में लगातार लगाई जा रही है। परिणामस्वरूप वे अपने मूल दायित्व—नालों की सफाई की निगरानी, अतिक्रमण हटाने, निर्माण कार्यों की जांच, जल निकासी व्यवस्था और शहर के तकनीकी प्रबंधन—के लिए पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं।
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है।
क्या हम प्रशासनिक तंत्र का उपयोग उसके मूल उद्देश्य के अनुरूप कर रहे हैं, या फिर शासकीय दायित्वों का बढ़ता विस्तार कहीं प्रशासनिक कार्यों पर ही “शासकीय अतिक्रमण” बनता जा रहा है?
यह प्रश्न किसी सरकार, अधिकारी या विभाग की आलोचना नहीं, बल्कि प्रशासनिक दक्षता पर गंभीर चिंतन का विषय है।
एक अभियंता का सबसे बड़ा दायित्व फील्ड में होना है। उसकी पहचान कार्यालय की कुर्सी से नहीं, बल्कि शहर की सड़कों, नालों, पुलों, निर्माण स्थलों और नागरिक समस्याओं के समाधान से होती है। यदि वही अभियंता अधिकांश समय गैर-तकनीकी दायित्वों में व्यस्त रहेगा, तो शहर की आधारभूत व्यवस्थाओं की निगरानी कौन करेगा?
आज आवश्यकता अधिकारियों की आलोचना करने की नहीं, बल्कि उनकी कार्यक्षमता को मुक्त करने की है।
देश की प्रशासनिक सेवाएँ—IAS, IPS, RAS, अभियंता और अन्य अधिकारी—राष्ट्र निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत शक्ति हैं। ये अधिकारी कठिन परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हैं। किंतु यदि इन्हें बार-बार ऐसे कार्यों में लगाया जाएगा जो इनके मूल दायित्वों से अलग हैं, तो इसका प्रत्यक्ष प्रभाव शासन की गुणवत्ता और नागरिक सेवाओं पर दिखाई देना स्वाभाविक है।
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सरकारी योजनाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जनकल्याणकारी अभियान भी आवश्यक हैं। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि शहर की नियमित व्यवस्थाएँ प्रभावित न हों। नाले भी समय पर साफ हों, अतिक्रमण भी हटें, निर्माणों की जांच भी हो और जनता की शिकायतों का भी समयबद्ध समाधान मिले।
आज आवश्यकता किसी पर दोषारोपण की नहीं, बल्कि प्रशासनिक संतुलन स्थापित करने की है। सरकार यदि तकनीकी अधिकारियों को उनके मूल कार्यों के लिए पर्याप्त समय और स्वतंत्रता सुनिश्चित करे तथा विशेष अभियानों के लिए पृथक मानव संसाधन विकसित करे, तो न केवल शहरों की व्यवस्थाएँ बेहतर होंगी बल्कि अधिकारियों की कार्यक्षमता और मनोबल भी बढ़ेगा।
अजमेर आज केवल नालों की सफाई या अतिक्रमण हटाने की मांग नहीं कर रहा। वह ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था की अपेक्षा कर रहा है जिसमें कर्तव्य और प्राथमिकता के बीच संतुलन हो, जिम्मेदारी और जवाबदेही साथ-साथ चलें तथा अधिकारी अपने वास्तविक दायित्वों का निर्वहन पूरी क्षमता से कर सकें।
सरकार से अपेक्षा है कि वह इस विषय को केवल अजमेर की समस्या न मानकर प्रशासनिक सुधार के अवसर के रूप में देखे। यदि तकनीकी अधिकारियों को उनके मूल कार्यों के लिए अधिक समय और संसाधन उपलब्ध कराए जाते हैं, तो इसका लाभ केवल अजमेर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की नगरीय व्यवस्थाओं को मिलेगा।
एक सक्षम अधिकारी व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी होता है।
उसे उसके मूल दायित्व निभाने का अवसर देना ही सुशासन की पहली शर्त है।
