रीवा। विकास की बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को अक्सर तरक्की की पहचान बताकर पेश किया जाता है, लेकिन जब उसी परियोजना के आसपास रहने वाले ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करने को मजबूर हों, तो विकास के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसा ही एक गंभीर मामला रीवा जिले की गुढ़ विधानसभा क्षेत्र के बधवार पहाड़ स्थित 750 मेगावाट क्षमता वाले अल्ट्रा मेगा सोलर पावर प्रोजेक्ट से जुड़ा सामने आया है। देश के प्रमुख सौर ऊर्जा संयंत्रों में गिने जाने वाले इस प्रोजेक्ट से उत्पादित बिजली दिल्ली और मेट्रो रेल व्यवस्था तक पहुंचती है, लेकिन स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि इस परियोजना की चमक उनके गांवों की जिंदगी तक नहीं पहुंच सकी।
बिजली उत्पादन में देश के लिए मिसाल, स्थानीय गांवों में सुविधाओं का इंतजार
बधवार सोलर परियोजना के आसपास बसे डढ़वा, बरसयता, इटार, तमारा, बधवार और मनीकवार सहित कई गांवों के लोगों ने परियोजना की स्थापना के दौरान किए गए वादों पर सवाल खड़े किए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उस समय उन्हें निर्बाध बिजली आपूर्ति, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर और क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार की उम्मीद दिखाई गई थी। मगर वर्षों बाद भी इन अपेक्षाओं के अनुरूप बदलाव नजर नहीं आ रहा है।ग्रामीणों के मुताबिक, एक ओर सैकड़ों मेगावाट बिजली का उत्पादन कर राष्ट्रीय ऊर्जा जरूरतों में योगदान दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर परियोजना से प्रभावित गांवों को बिजली कटौती जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लोगों का सवाल है कि जिस क्षेत्र की जमीन और संसाधनों से इतनी बड़ी परियोजना संचालित हो रही है, वहां के निवासियों को इसका प्रत्यक्ष लाभ आखिर कब मिलेगा?
खेत तक पहुंचने के लिए 15 से 20 किलोमीटर का अतिरिक्त सफर
इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू किसानों की आवागमन संबंधी परेशानी है। ग्रामीणों का आरोप है कि सोलर प्लांट का विस्तृत क्षेत्र उनके पारंपरिक रास्तों और खेतों तक पहुंचने के मार्ग में बाधा बन गया है। नतीजतन, कई किसानों को अपने ही खेतों तक पहुंचने के लिए लगभग 15 से 20 किलोमीटर तक का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है।खेती-किसानी पर निर्भर परिवारों के लिए यह केवल रास्ते की समस्या नहीं, बल्कि समय, श्रम और आर्थिक नुकसान से जुड़ा सवाल है। ग्रामीणों का कहना है कि इस परेशानी को लेकर जनप्रतिनिधियों के माध्यम से कई बार पत्राचार और शिकायतें की गईं, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।
सोलर पैनलों से बढ़ती गर्मी को लेकर भी ग्रामीणों की चिंता
परियोजना के आसपास रहने वाले कुछ ग्रामीणों ने सोलर पैनलों के कारण क्षेत्र में गर्मी और तपन बढ़ने की बात भी कही है। हालांकि इस दावे की वैज्ञानिक पुष्टि और पर्यावरणीय प्रभावों का स्वतंत्र आकलन आवश्यक है। ग्रामीण चाहते हैं कि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों और स्थानीय परिस्थितियों का भी गंभीरता से परीक्षण कराया जाए, ताकि उनकी आशंकाओं का तथ्यात्मक समाधान हो सके।
कलेक्टर के संज्ञान में पहुंचा मामला, जांच के आश्वासन से जगी उम्मीद
लगातार सामने आ रही शिकायतों के बाद अब यह मामला रीवा कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी के संज्ञान में पहुंचा है। बताया जा रहा है कि कलेक्टर ने ग्रामीणों द्वारा उठाई गई समस्याओं की जांच कराने और तथ्यों के आधार पर उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया है।अब प्रशासन के सामने यह चुनौती है कि वह ग्रामीणों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराए और बिजली आपूर्ति, रोजगार, आवागमन तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवालों पर स्पष्ट स्थिति सामने लाए।
सबसे बड़ा सवाल: विकास का लाभ स्थानीय लोगों तक कब पहुंचेगा?
बधवार की सौर परियोजना देश की ऊर्जा जरूरतों में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। इसमें दो राय नहीं कि सौर ऊर्जा भविष्य की जरूरत है और ऐसी परियोजनाएं ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन विकास की वास्तविक सफलता केवल बिजली उत्पादन के आंकड़ों से नहीं, बल्कि उससे प्रभावित स्थानीय आबादी के जीवन में आए सकारात्मक बदलाव से भी मापी जानी चाहिए। सवाल यह नहीं कि बधवार से कितनी बिजली दिल्ली पहुंच रही है, सवाल यह है कि जिस इलाके ने इस परियोजना के लिए अपनी जमीन और रास्तों से जुड़ी चुनौतियां झेली हैं, वहां के ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाओं का हक कब मिलेगा? अब ग्रामीणों की निगाहें जिला प्रशासन की जांच और उसके बाद होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं।
