एक पिता की गोद में बेटी की बेजान देह: क्या आस्था और उत्सव के नाम पर जानलेवा डीजे का यह शोर अब भी बंद नहीं होगा?

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​मध्य प्रदेश | मध्य प्रदेश के बैतूल में 25 सितंबर की रात गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई। जेएच कॉलेज में बीएससी प्रथम वर्ष की 17 वर्षीय छात्रा प्रतीक्षा वर्मा विसर्जन कार्यक्रम में शामिल होने गई थी, जहाँ कानफोड़ू डीजे की धमक और भारी शोर के बीच अचानक उसकी तबीयत बिगड़ी और वह अचेत होकर गिर पड़ी। बेबस पिता अपनी लाडली को गोद में लेकर अस्पताल की ओर भागे, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। परिजनों ने इस दर्दनाक हादसे का सीधा संबंध तेज डीजे से जोड़ा है। हालांकि पुलिस के अनुसार बचपन की बीमारी और मौत के वास्तविक चिकित्सकीय कारणों की अंतिम रिपोर्ट आना अभी बाकी है, लेकिन इस हृदयविदारक दृश्य ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। एक पिता की गोद में अपनी 17 साल की बेटी की निष्प्राण देह का यह मंजर हमारी सामाजिक संवेदनहीनता पर एक गहरा तमाचा है।

​आस्था का उल्लास या ध्वनि का आतंक?

​त्योहार जीवन, आनंद और सौहार्द का प्रतीक होते हैं, लेकिन आज हमारे धार्मिक और सामाजिक जुलूस श्रद्धा के केंद्र कम और शक्ति-प्रदर्शन व ध्वनि प्रदूषण के अखाड़े ज्यादा बन चुके हैं। सड़कों पर बजने वाले हजारों वॉट के विशाल साउंड सिस्टम्स और डीजे से उठने वाला तीव्र कंपन सीधे इंसान के सीने और दिल की धड़कनों पर चोट करता है।

​स्वास्थ्य पर जानलेवा प्रहार: अत्यधिक ध्वनि और भारी बेस (Bass) कमजोर दिल, बुजुर्गों, नन्हे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बीमार लोगों के लिए अत्यंत घातक साबित होता है; यह हृदय गति को अनियंत्रित कर अचानक दिल के दौरे की वजह बन सकता है।

​लाचार सुरक्षा और आपातकालीन तंत्र: जब सड़कों पर कानों को फाड़ देने वाला शोर गूंजता है, तब किसी घायल की चीख, मदद की गुहार या जीवन बचाती एम्बुलेंस का सायरन तक दब जाता है। ऐसे हालात में प्रशासन और आम लोग किसी भी अनहोनी पर समय रहते प्रतिक्रिया देने में पूरी तरह असमर्थ हो जाते हैं।

​सिर्फ कागजी कार्रवाई नहीं, अब देशभर में चाहिए पूर्ण पाबंदी

​बैतूल में हादसे के बाद पुलिस द्वारा 10 डीजे संचालकों पर की गई कार्रवाई यह तो दर्शाती है कि कानून मौजूद है, लेकिन सवाल यह है कि ऐसे जानलेवा सिस्टम्स को सड़कों पर उतरने की अनुमति ही क्यों दी जाती है? क्या कुछ घंटों के कृत्रिम मनोरंजन और अनियंत्रित शोर के लिए किसी निर्दोष के जीने का बुनियादी अधिकार छीना जा सकता है?

​अब समय केवल शोक व्यक्त करने या जांच रिपोर्टों का इंतजार करने का नहीं है, बल्कि पूरे देश में एक सख्त और स्थायी संदेश देने का है:

​देशव्यापी पूर्ण प्रतिबंध: रिहायशी इलाकों, सार्वजनिक सड़कों, धार्मिक जुलूसों और बारात आदि में कानफोड़ू डीजे सिस्टम्स पर देशभर में गैर-जमानती प्रतिबंध लागू हो।

​सख्त कानूनी जवाबदेही: ध्वनि प्रदूषण के तय मानकों का उल्लंघन होने पर केवल मामूली चालान न काटे जाएं, बल्कि भारी साउंड मशीनरी को तत्काल जब्त कर आयोजकों और संचालकों पर गंभीर आपराधिक धाराओं में मुकदमा चले।

​सामाजिक बहिष्कार: समाज को स्वयं आगे आकर यह संकल्प लेना होगा कि जिस आयोजन का शोर किसी कमजोर, बुजुर्ग या बच्चे की सांसों पर भारी पड़ जाए, वह उत्सव नहीं बल्कि अपराध है।

​प्रतीक्षा तो अब कभी लौटकर नहीं आ सकती, लेकिन उसकी असमय मौत से उपजा यह सन्नाटा यदि हमारे बहरे हो चुके कानों और सोए हुए जमीर को जगा सके, तभी उस लाचार पिता के आंसुओं के साथ न्याय होगा। ईश्वर की भक्ति शांत मन और सच्ची श्रद्धा मांगती है, किसी जानलेवा डीजे का शोर नहीं। बंद हों ये जानलेवा डीजे, ताकि किसी और पिता को अपनी फूल-सी बेटी की बेजान देह गोद में न उठानी पड़े। – देवेन्द्र सक्सैना 

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