भारत के लोकतंत्र के लिए यह समय बेहद गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। रांची में BJP कार्यालय के बाहर कांग्रेस और BJP कार्यकर्ताओं के बीच टकराव, पत्थरबाजी और मीडियाकर्मी के घायल होने की खबर हो या पटना के सदाकत आश्रम के बाहर दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच हुई हिंसक झड़प—घटनाओं की यह श्रृंखला सिर्फ राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि देश के बदलते राजनीतिक माहौल का संकेत देती दिखाई दे रही है।
रांची में प्रदर्शन के दौरान नारेबाजी से शुरू हुआ विवाद पत्थरबाजी तक पहुंच गया। रिपोर्टों के मुताबिक, इस घटना में कई लोग घायल हुए और एक पत्रकार भी चोटिल हुआ। पटना में भी BJP के प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ टकराव की स्थिति बनी और पत्थरबाजी की खबर सामने आई। मुंबई में भी राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों के बीच BJP और कांग्रेस आमने-सामने नजर आए।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर देश किस दिशा में जा रहा है?
दिल्ली में छात्रों और युवाओं के आंदोलन से शुरू हुआ असंतोष अब राजनीतिक टकराव का रूप लेता दिखाई दे रहा है। NEET कथित पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था को लेकर छात्रों के विरोध के बीच दिल्ली में बड़े प्रदर्शन हुए और उसके बाद देश के कई हिस्सों में विरोध तथा जवाबी प्रदर्शन देखने को मिले।
लोकतंत्र में विरोध अपराध नहीं है। सवाल पूछना भी अपराध नहीं है। सरकार से जवाब मांगना भी अपराध नहीं है। लेकिन जब राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता एक-दूसरे के खिलाफ सड़क पर उतरकर पत्थर और लाठी का इस्तेमाल करने लगें, जब मीडिया कर्मी भी इसकी चपेट में आने लगें, तब यह लोकतंत्र की सेहत के लिए खतरे की घंटी है।
आज सबसे बड़ा सवाल युवाओं से जुड़ा है।
देश का युवा रोजगार चाहता है। बेहतर शिक्षा चाहता है। पारदर्शी परीक्षाएं चाहता है। वह अपने भविष्य की सुरक्षा चाहता है। लेकिन यदि उसके सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और सड़क की हिंसा में मिलने लगे तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
सरकार को यह समझना होगा कि युवाओं की आवाज को दबाने से सवाल खत्म नहीं होते। दूसरी ओर राजनीतिक दलों को भी समझना होगा कि युवाओं को अपने राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाना लोकतंत्र की सेवा नहीं है।
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रांची, पटना, मुंबई और दिल्ली की घटनाएं एक ही सवाल पूछ रही हैं—क्या राजनीति अब संवाद की जगह टकराव की ओर बढ़ रही है?
यदि सत्ता और विपक्ष दोनों समय रहते नहीं चेते, तो आने वाले दिनों में राजनीतिक संघर्ष और अधिक उग्र हो सकता है। देश के भीतर असंतोष का फायदा उठाने वाली ताकतें भी सक्रिय हो सकती हैं। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं है। उसे युवाओं के सवालों का जवाब भी देना होगा।
और युवाओं से भी एक अपील है—आपकी ताकत पत्थर में नहीं, आपके सवाल में है। आपकी आवाज लाठी से नहीं, संविधान से मजबूत होती है।
परिवर्तन चाहिए तो लोकतांत्रिक रास्ते से आए। सरकार से सवाल पूछिए, जवाब मांगिए, शांतिपूर्ण आंदोलन कीजिए, लेकिन हिंसा को रास्ता मत बनने दीजिए।
क्योंकि इतिहास गवाह है—सत्ता बदलने से बड़ा परिवर्तन तब आता है जब समाज की सोच बदलती है।
आज देश के युवाओं को किसी पार्टी के झंडे के नीचे खड़ा होने से पहले अपने भविष्य के सवालों के साथ खड़ा होना होगा। और सरकार को यह तय करना होगा कि वह युवाओं को गले लगाएगी, उनकी बात सुनेगी और जवाब देगी—या बढ़ते असंतोष को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर टालती रहेगी।
क्योंकि सड़कों पर बढ़ता राजनीतिक टकराव किसी एक पार्टी की हार-जीत नहीं है। यह लोकतंत्र के लिए चेतावनी है।
और यदि यह चेतावनी आज नहीं सुनी गई, तो कल इतिहास पूछेगा—
जब देश का युवा सवाल पूछ रहा था, तब सत्ता और राजनीति कहां खड़ी थी?
