अजमेर में आज निकाय चुनाव की सियासत अपने पूरे रंग में दिखाई दी। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के रोड शो ने शहर की सड़कों को चुनावी अखाड़े में बदल दिया। भाजपा ने इसे जनसमर्थन और अपनी ताकत का प्रदर्शन बताया, जबकि विपक्ष ने सवाल उठाया कि जनता को रोड शो नहीं, सड़क चाहिए; भाषण नहीं, सीवरेज चाहिए और चुनावी नारों से ज्यादा जरूरी है रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान। यही लोकतंत्र का सबसे दिलचस्प व्यंग्य है—चुनाव आते ही वही गलियां, वही सड़कें और वही जनता अचानक नेताओं की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन जाती हैं, जिनकी शिकायतें चुनाव के बाद अक्सर फाइलों में लंबी नींद सो जाती हैं।
भाजपा के लिए अजमेर का चुनाव केवल पार्षद चुनने का मामला नहीं, बल्कि सरकार और संगठन की जमीनी पकड़ का भी इम्तिहान है। मुख्यमंत्री का खुद मैदान में उतरना बताता है कि पार्टी इस चुनाव को कितनी गंभीरता से ले रही है। भाजपा का तर्क है कि राज्य में उसकी सरकार है और नगर निकायों में भी मजबूत जनादेश मिलने से विकास कार्यों को बेहतर गति दी जा सकती है। लेकिन लोकतंत्र में सवाल पूछना भी जरूरी है—अगर जनता विकास से इतनी संतुष्ट है तो उसे समझाने के लिए इतने बड़े रोड शो की जरूरत क्यों पड़ रही है? इसका जवाब भाषणों से नहीं, मतदान के दिन मिलेगा।
यह भी पढ़ें :
दूसरी ओर कांग्रेस ने सरकार को सड़क, सीवरेज, सफाई और स्थानीय समस्याओं के मुद्दे पर घेरने की कोशिश की है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी मुख्यमंत्री के रोड शो को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। विपक्ष का संदेश है कि जनता को राजनीतिक प्रदर्शन नहीं बल्कि जमीन पर परिणाम चाहिए। लेकिन कांग्रेस को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता विपक्ष से भी हिसाब मांगती है। केवल सरकार की कमियां गिनाने से वोट नहीं मिलता; जनता यह भी पूछती है कि जब आपके पास सत्ता थी तब आपने क्या किया और आज आप उसके लिए कितनी मजबूती से खड़े हैं।
अजमेर के चुनावी समीकरण में भाजपा के भीतर टिकट वितरण को लेकर सामने आया असंतोष और संभावित बागी तेवर भी महत्वपूर्ण हैं। राजनीति का पुराना सच है कि सामने खड़ा विरोधी दिखाई देता है, लेकिन भीतर बैठी नाराजगी चुनावी गणित को ज्यादा तेजी से बदल सकती है। जिस कार्यकर्ता ने वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाया हो, अगर टिकट की दौड़ में उसका नाम छूट जाए तो कभी-कभी वही कार्यकर्ता अपना झंडा लेकर मैदान में उतर जाता है। हालांकि कांग्रेस के लिए भाजपा की अंदरूनी नाराजगी को अपनी जीत का प्रमाण मान लेना भी जल्दबाजी होगी, क्योंकि अजमेर की जनता किसी पार्टी की कमजोरी पर नहीं बल्कि अपने वार्ड के भविष्य पर वोट करेगी।
नगर निकाय चुनाव की असली कसौटी बड़े भाषण नहीं बल्कि छोटी-छोटी सुविधाएं हैं—सड़क कैसी है, नाली साफ है या नहीं, कचरा समय पर उठता है या नहीं, पानी और सीवरेज की स्थिति क्या है, स्ट्रीट लाइट जलती है या नहीं और सबसे महत्वपूर्ण यह कि चुनाव जीतने के बाद पार्षद जनता के बीच दिखाई देता है या नहीं। यही वह जमीन है जहां राजनीति के बड़े-बड़े दावे अक्सर एक साधारण नागरिक के सवाल के सामने छोटे पड़ जाते हैं।
आज नेताओं के हाथ में माइक है, मंच है और रोड शो की भीड़ है, लेकिन मतदान के दिन जनता के हाथ में सिर्फ एक बटन होगा और वही बटन तय करेगा कि किसके दावे में दम था और किसकी राजनीति केवल शोर थी। चुनाव से पहले जनता को ‘जनार्दन’ कहकर उसके दरवाजे तक पहुंचना भारतीय राजनीति की पुरानी परंपरा है, मगर लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब चुनाव खत्म हो जाए और वही जनता अपनी समस्या लेकर नेता के दरवाजे पर पहुंचे।
इसलिए अजमेर में आज का रोड शो जितना भाजपा की ताकत का प्रदर्शन है, उतना ही आने वाले दिनों में जनता के फैसले की परीक्षा भी है। कांग्रेस के सामने सरकार की नाकामियां मुद्दा बनाने की चुनौती है, भाजपा के सामने अपने संगठन और बागियों को संभालने की चुनौती है और निर्दलीयों के सामने यह साबित करने की चुनौती है कि पार्टी से बाहर निकलकर वे जनता का भरोसा जीत सकते हैं।

अंततः फैसला न भाजपा के रोड शो से होगा, न कांग्रेस के आरोपों से और न ही सोशल मीडिया के शोर से—फैसला होगा उस खामोश मतदाता से, जो सबको सुनता है, सबको देखता है और मतदान के दिन बिना भाषण दिए अपना फैसला सुना देता है।
आज सड़क पर नेताओं का रोड शो है, कल लोकतंत्र की सड़क पर जनता का फैसला होगा। क्योंकि लोकतंत्र में भीड़ नहीं, वोट बोलता है और रोड शो नहीं, जनता का फैसला सबसे बड़ा शक्ति प्रदर्शन होता है।
