एक कलम चली… और चारागाह से फार्म हाउस तक पहुंच गई जमीन!

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पुष्कर की जमीन से अजमेर की पहाड़ियों तक: आखिर किसके नाम लिखी जा रही है सरकारी जमीन?

अजमेर/पुष्कर | सरकारी जमीन पर कब्जे की बात सामने आती है तो अक्सर उंगली भूमाफिया या प्रभावशाली लोगों की तरफ उठती है। लेकिन पुष्कर की करीब 166.7551 हेक्टेयर चारागाह भूमि से जुड़ा मामला इससे भी बड़ा सवाल खड़ा करता है। यहां सवाल यह है कि जब जमीन के उपयोग को बदलने की प्रक्रिया ही सरकारी स्तर पर आगे बढ़े, तो आखिर जिम्मेदार किसे माना जाए और आम आदमी अपनी जमीन व सामुदायिक संसाधनों की रक्षा के लिए किस दरवाजे पर जाए?

राजस्व रिकॉर्ड में चारागाह के रूप में दर्ज इस भूमि को प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए अजमेर विकास प्राधिकरण के अधीन किया गया और इसके बाद इसी जमीन पर ‘फार्म एंड हाउस स्कीम कनास’ का लेआउट तैयार किए जाने तथा फार्म हाउसों की नीलामी प्रक्रिया आगे बढ़ने का मामला सामने आया। अधिवक्ता अशोक रावत की याचिका के बाद मामला राजस्थान हाईकोर्ट पहुंचा है। अदालत ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में योजना पर रोक तथा निर्माण, आवंटन और विकास गतिविधियों पर प्रतिबंध की मांग भी उठाई गई है।

यहां से कहानी केवल जमीन की नहीं, जवाबदेही की शुरू होती है। यदि जमीन चारागाह थी तो उसे फार्म हाउस योजना के लिए चुने जाने का आधार क्या था? किस स्तर पर प्रस्ताव तैयार हुआ? किस अधिकारी ने उसका परीक्षण किया? सार्वजनिक हित का आकलन किसने किया? स्थानीय लोगों और पशुपालकों की आपत्तियों को कितना महत्व दिया गया? और यदि पूरी प्रक्रिया में कोई गलती हुई तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी?

एक सरकारी आदेश कुछ पन्नों की फाइल हो सकता है, लेकिन उसका असर जमीन पर पीढ़ियों तक रहता है। एक कलम से जमीन का स्वरूप बदल सकता है, दूसरी प्रक्रिया से योजना तैयार हो सकती है और आगे चलकर वही जमीन निजी उपयोग तक पहुंच सकती है। लेकिन जब कोई ग्रामीण सवाल उठाता है तो उसे शिकायत, विभागीय कार्यालय, प्रशासन और अंततः अदालत के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यही इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा विरोधाभास है—निर्णय लेने वाला सिस्टम तेज, लेकिन गलती सुधारने वाला सिस्टम इतना धीमा कि आम आदमी को न्याय के लिए अदालत तक जाना पड़े।

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मामला केवल पुष्कर की इस जमीन तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि पुष्कर की पहाड़ियों पर बस्तियां कैसे बढ़ीं और अजमेर की पहाड़ियों पर निर्माण कैसे फैलता गया? किसी पहाड़ी पर पहली नींव रखे जाने के समय जिम्मेदार विभाग कहां था? पहली सड़क बनते समय निगरानी तंत्र कहां था? कुछ मकान बनने के बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और जब निर्माण बढ़कर बस्तियों का रूप ले चुका, तब प्रशासन को जमीन और नियमों की याद क्यों आई?

यदि कोई निर्माण नियमों के खिलाफ है तो जिम्मेदारी केवल उस व्यक्ति की क्यों हो जिसने आखिरी ईंट लगाई? पहली ईंट से लेकर पूरी बस्ती खड़ी होने तक सरकारी निगरानी तंत्र की भूमिका भी जांच के दायरे में क्यों नहीं आनी चाहिए?

यही वह सवाल है जहां ‘दोषी कौन?’ का प्रश्न सामने आता है। सरकारी फाइल चलती है, आदेश निकलता है, योजना बनती है, काम आगे बढ़ता है, कोई आपत्ति करता है, मामला अदालत पहुंचता है और फिर संबंधित विभाग अदालत में जवाब दाखिल करता है। लेकिन यदि बाद में प्रक्रिया में गलती सामने आती है तो सवाल वहीं खड़ा रहता है—गलती किसकी थी और उसकी जिम्मेदारी किसने ली?

हमारे प्रशासनिक सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोरी कहीं यही तो नहीं कि निर्णय सामूहिक प्रक्रिया से होते हैं, लेकिन जिम्मेदारी तय करते समय कोई एक जिम्मेदार व्यक्ति सामने नहीं आता? आम आदमी की शिकायत वर्षों तक चलती रहती है और अंततः उसे न्याय के लिए अदालत का सहारा लेना पड़ता है। सवाल यह है कि अदालत जनता की आखिरी उम्मीद क्यों बने, जबकि प्रशासन को विवाद पैदा होने से पहले ही उसे रोकना चाहिए?

पुष्कर की चारागाह भूमि का मामला सरकार के लिए एक बड़ा अवसर भी है। सरकार चाहे तो अजमेर जिले की सरकारी और सामुदायिक जमीनों का व्यापक रिकॉर्ड सार्वजनिक कर सकती है। यह बताया जा सकता है कि कितनी चारागाह भूमि है, पिछले वर्षों में कितनी भूमि का उपयोग बदला गया, किन आदेशों के तहत बदला गया, किस उद्देश्य से बदला गया, कितनी जमीन पर निजी निर्माण हुआ और शिकायतों के बाद कितने मामलों में कार्रवाई की गई।

क्योंकि सवाल केवल यह नहीं है कि 166.7551 हेक्टेयर जमीन का क्या होगा। सवाल यह है कि अगर एक सार्वजनिक संसाधन का चरित्र प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिए बदला जा सकता है, तो भविष्य में ऐसी कितनी जमीनें इसी प्रक्रिया से दूसरे उपयोग में लाई गई होंगी?

आज सवाल चारागाह का है। कल किसी पहाड़ी का हो सकता है। परसों किसी तालाब, नाले या सार्वजनिक रास्ते का। इसलिए सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि विकास के नाम पर सार्वजनिक संसाधनों की सीमा और सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन तय करेगा।

पुष्कर कोई सामान्य भू-भाग नहीं है। यह धार्मिक आस्था, पर्यटन, ग्रामीण जीवन, पशुपालन और प्राकृतिक संसाधनों का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां चारागाह खत्म होना केवल जमीन का उपयोग बदलना नहीं है। इसका सीधा असर पशुपालकों, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक संतुलन पर पड़ सकता है।

सरकार एक तरफ गौवंश संरक्षण और पशुधन संरक्षण की बात करती है। पशुपालकों के लिए योजनाएं बनाती है। लेकिन पशुओं के चरने के लिए जमीन ही कम होती जाएगी तो संरक्षण की योजनाओं का आधार क्या रहेगा? गाय के लिए चारा चाहिए, चारे के लिए चारागाह चाहिए और चारागाह के लिए जमीन चाहिए। ऐसे में चारागाह भूमि के दूसरे उपयोग का सवाल सरकार की नीतियों के सामने भी खड़ा होता है।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या सरकारी खजाने में राजस्व आ जाना ही किसी सामुदायिक जमीन के व्यावसायिक उपयोग को जायज ठहराने के लिए पर्याप्त है? यदि ऐसा तर्क स्वीकार कर लिया जाए तो भविष्य में किसी तालाब, सार्वजनिक रास्ते या दूसरी सामुदायिक जमीन को भी इसी आधार पर व्यावसायिक उपयोग में लाने का रास्ता खुल सकता है।

इसीलिए पुष्कर का यह मामला केवल एक फार्म हाउस योजना का विवाद नहीं माना जाना चाहिए। यह सरकारी जमीन, सार्वजनिक हित और प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा है।

अब सरकार को अदालत के सामने जवाब देने के साथ-साथ जनता के सामने भी जवाब देना होगा—चारागाह की जमीन का उपयोग बदलने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका सार्वजनिक हित क्या था? पशुपालकों और ग्रामीणों पर इसके प्रभाव का आकलन किसने किया? और यदि निर्णय प्रक्रिया में कोई गलती हुई तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

क्योंकि जनता को केवल यह नहीं जानना कि जमीन किसके नाम हुई। जनता यह भी जानना चाहती है कि फैसला किसने किया, किस आधार पर किया और उस फैसले की जवाबदेही किसकी है।

पुष्कर की यह जमीन आज अदालत में है, लेकिन असली सवाल अदालत से बाहर भी खड़ा है। सवाल उस व्यवस्था से है जिसमें सरकारी फाइल आगे बढ़ जाती है, जमीन का स्वरूप बदल जाता है, विवाद पैदा होता है, आम आदमी अदालत पहुंचता है और फिर भी यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि आखिर जिम्मेदार कौन है?

विकास जरूरी है, लेकिन विकास की कीमत सार्वजनिक जमीन, पशुपालक और आने वाली पीढ़ियों के अधिकार से नहीं चुकाई जा सकती।

सवाल अब सिर्फ 166.7551 हेक्टेयर जमीन का नहीं है। सवाल है—पुष्कर की चारागाह, अजमेर की पहाड़ियां और सार्वजनिक जमीन आखिर किसके लिए हैं?

विकास किसका? जमीन किसकी? फायदा किसका? और कीमत कौन चुका रहा है?

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