अजमेर। नगर निगम में नई महापौर अनामिका शर्मा और उपमहापौर हेमंत सांखला ने गुरुवार को विधिवत पदभार संभाल लिया। निगम परिसर में पूजा-अर्चना और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच नई जिम्मेदारी की शुरुआत हुई, लेकिन इसी दौरान निगम के बाहर कांग्रेस पार्षदों और कार्यकर्ताओं का विरोध भी देखने को मिला। एक ही परिसर में सत्ता के पदभार और विपक्ष के प्रदर्शन की यह तस्वीर अजमेर की नई निगम राजनीति की दिशा का संकेत देती नजर आई।
महापौर पद पर अनामिका शर्मा के निर्वाचन के बाद भाजपा ने निगम की कमान संभाल ली है। पदभार ग्रहण के दौरान भाजपा नेताओं और समर्थकों ने उनका स्वागत किया। महापौर ने शहर के विकास, सफाई व्यवस्था और जनसमस्याओं के समाधान को प्राथमिकता देने की बात कही। उपमहापौर हेमंत सांखला ने भी सभी वार्डों में विकास कार्यों को गति देने का भरोसा जताया।
लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष निगम के मुख्य द्वार पर दिखाई दिया। कांग्रेस पार्षदों और कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। कांग्रेस की ओर से चुनाव प्रक्रिया और पार्षदों को पदभार ग्रहण समारोह में प्रवेश नहीं दिए जाने को लेकर सवाल उठाए गए। कांग्रेस ने चुनाव में अनियमितताओं और राजनीतिक दबाव सहित कई आरोप लगाए हैं। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
सबसे अधिक चर्चा अभी भी उपमहापौर चुनाव के 40-40 के मुकाबले को लेकर है। भाजपा के हेमंत सांखला और कांग्रेस के नौरत गुर्जर को बराबर 40-40 मत मिले। बराबरी की स्थिति में पर्ची के माध्यम से फैसला हुआ और हेमंत सांखला विजेता घोषित किए गए। अब इसी प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस प्रत्याशी की ओर से जिला निर्वाचन अधिकारी को ज्ञापन देकर जांच की मांग किए जाने की बात सामने आई है।
यहीं से अजमेर निगम की नई कहानी में पहला बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या चुनाव समाप्त होने के बाद विवाद भी समाप्त हो जाएगा, या नए बोर्ड की पहली परीक्षा इन्हीं सवालों से होगी?
अजमेर नगर निगम में 80 पार्षद हैं। महापौर चुनाव में अनामिका शर्मा को 43 और कांग्रेस प्रत्याशी किरण गढ़वाल को 37 मत मिले थे। इसके बाद उपमहापौर चुनाव में 40-40 की बराबरी और पर्ची से फैसला हुआ। आंकड़े अपनी जगह हैं, लेकिन इन आंकड़ों के पीछे बने राजनीतिक समीकरण अब अजमेर की राजनीति में चर्चा का विषय हैं।
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सवाल किसी एक दल के पक्ष या विपक्ष का नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता का है। यदि चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं तो उनका जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि नियम, रिकॉर्ड और तथ्यों से मिलना चाहिए। विपक्ष को अपनी बात रखने का लोकतांत्रिक अवसर मिलना चाहिए और सत्ता पक्ष को भी जनता के सामने अपने फैसलों का हिसाब देना चाहिए।
अब नई महापौर और उपमहापौर के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक जीत को प्रशासनिक परिणाम में बदलने की है। अजमेर की जनता को सफाई, सड़क, सीवरेज, अतिक्रमण, यातायात, जलभराव और विकास कार्यों पर परिणाम चाहिए—राजनीतिक बयान नही ।
चुनाव हो गया, कुर्सियां मिल गईं, पदभार भी संभाल लिया गया… अब क्या निगम में जनता के सवालों की भी बारी आएगी?
