अजमेर: 30-30 से 40-40 तक… सिस्टम पर अतिक्रमण या सियासत का संजोग?

Spread the love

जनता वोट दे, पर्ची निकले और सिस्टम रास्ता बनाए? अजमेर की चुनावी प्रक्रिया पर बड़ा सवाल—लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा कब तक?

अजमेर की सियासत में आंकड़े बदलते रहे, चेहरे बदलते रहे, लेकिन चुनावी संयोगों की कहानी जैसे वहीं खड़ी है। कभी 30-30, फिर एक वोट और अब 40-40। कभी एक वोट ने जनप्रतिनिधि का फैसला किया तो कभी पर्ची ने कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता खोला। सवाल पर्ची निकलने की वैधानिकता का नहीं है, सवाल उस भरोसे का है जिस पर लोकतंत्र खड़ा होता है। जब जनता वोट देती है और निर्वाचित प्रतिनिधि आगे अपने बीच से महापौर या उपमहापौर चुनते हैं, तब क्या उस पूरी प्रक्रिया पर जनता को पूरा भरोसा होना चाहिए या सिर्फ परिणाम स्वीकार कर लेना ही लोकतंत्र की मजबूरी है?

वर्ष 2015 अजमेर की राजनीतिक स्मृति में आज भी दर्ज है। नगर निगम महापौर चुनाव में भाजपा के धर्मेंद्र गहलोत और कांग्रेस समर्थित सुरेंद्र सिंह शेखावत को 30-30 वोट मिले। बराबरी के बाद लॉटरी से फैसला हुआ और धर्मेंद्र गहलोत महापौर बने। लेकिन पर्ची निकलने के साथ कहानी खत्म नहीं हुई। शेखावत ने चुनाव प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी और आरोप लगाया कि पहली लॉटरी उनके पक्ष में आने के बाद दोबारा लॉटरी कराई गई। इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने नोटिस भी जारी किया था। बाद की न्यायिक कार्यवाही में उनकी चुनौती आगे नहीं बढ़ सकी। यहां सवाल आरोप सही या गलत होने का नहीं, बल्कि यह है कि जब चुनाव इतना करीबी हो कि एक पर्ची सत्ता का फैसला करे, तब प्रक्रिया का हर कदम कैमरे और रिकॉर्ड के सामने क्यों नहीं होना चाहिए?

उस चुनाव का राजनीतिक अध्याय भी कम दिलचस्प नहीं था। सुरेंद्र सिंह शेखावत भाजपा के पार्षद थे, लेकिन पार्टी के अधिकृत महापौर प्रत्याशी के खिलाफ मैदान में उतर गए। भाजपा ने उन्हें छह वर्ष के लिए निष्कासित किया और कांग्रेस ने उनका समर्थन किया। राजनीति में समीकरण बदलते हैं, दल बदलते हैं, समर्थन बदलता है, लेकिन सबसे ज्यादा सवाल उस कार्यकर्ता के मन में पैदा होता है जो वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाता है और चुनाव आते ही देखता है कि राजनीतिक गणित उसकी मेहनत से बड़ा हो गया। सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का है जिसमें अनुशासन और सिद्धांतों की कसौटी परिस्थितियों के साथ बदलती दिखाई देती है।

फिर आया 2021। अजमेर नगर निगम के वार्ड 66 में भाजपा के नीरज जैन और कांग्रेस के गणेश चौहान के बीच मुकाबला इतना करीबी रहा कि नीरज जैन को महज एक वोट से विजेता घोषित किया गया। कांग्रेस की ओर से रिकाउंटिंग की मांग हुई और पुनर्गणना के बाद भी नतीजा कायम रहा। मतगणना केंद्र पर विवाद और तनाव की खबरें भी सामने आईं। यहां पर्ची नहीं निकली, लेकिन लोकतंत्र के सामने फिर वही सवाल खड़ा हुआ—जब एक वोट जनप्रतिनिधि और हारने वाले उम्मीदवार के बीच पूरी राजनीतिक दूरी तय कर देता है तो उस एक वोट की पारदर्शिता कितनी महत्वपूर्ण है?

और अब 2026। 22 सितंबर को अजमेर नगर निगम के उपमहापौर चुनाव में भाजपा के हेमंत सांखला और कांग्रेस के नौरत गुर्जर को 40-40 वोट मिले। बराबरी हुई तो पर्ची निकली और हेमंत सांखला के नाम की पर्ची निकलने पर उन्हें विजेता घोषित कर दिया गया। कानून में बराबर मत होने की स्थिति में लॉट से फैसला करने का प्रावधान है। इसलिए सिर्फ पर्ची निकलने को गैरकानूनी कहना सही नहीं होगा। लेकिन कानून किसी प्रक्रिया को वैधानिक बना सकता है, जनता का भरोसा अपने आप पैदा नहीं कर सकता।

यहीं से असली सवाल शुरू होता है। पर्ची किसने तैयार की? किसकी मौजूदगी में तैयार हुई? उम्मीदवारों या उनके प्रतिनिधियों को क्या देखने दिया गया? पर्ची किस प्रकार मोड़ी गई? किसने मिलाई? पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी हुई या नहीं? रिकॉर्ड सुरक्षित है या नहीं? और यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो रिकॉर्ड की जांच कराने में किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? कांग्रेस प्रत्याशी नौरत गुर्जर की ओर से इसी प्रक्रिया की जांच की मांग की गई है। लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि जांच की मांग और अनियमितता का प्रमाण—दो अलग बातें हैं।

2015 में भी चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल अदालत तक पहुंचे और 2026 में फिर प्रक्रिया की जांच की मांग सामने आई। इसे केवल संयोग कहें या चुनावी व्यवस्था के प्रति बार-बार पैदा हो रहे अविश्वास का संकेत—इसका फैसला राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि रिकॉर्ड और निष्पक्ष जांच ही कर सकती है।

अजमेर की कहानी इसलिए सिर्फ 30-30 से 40-40 तक के आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उस सिस्टम का आईना भी है जिसमें कार्यकर्ता वर्षों तक मेहनत करता है, टिकट की उम्मीद रखता है, फिर चुनावी समीकरण बदलते हैं और राजनीतिक फैसले अलग दिशा ले लेते हैं। कभी बगावत करने वाला नेता चर्चा में आता है, कभी उसके परिवार को टिकट मिलता है, कभी क्रॉस-वोटिंग की चर्चा होती है और कभी 40-40 पर पर्ची अंतिम फैसला करती है। जनता के लिए सवाल यही है कि राजनीति में सिद्धांत स्थायी हैं या समीकरण?

लोकतंत्र की सुरक्षा केवल वोट डालने से नहीं होती। लोकतंत्र तब सुरक्षित रहता है जब वोट की गिनती पर भरोसा हो, रिकाउंटिंग पर भरोसा हो, पर्ची की प्रक्रिया पर भरोसा हो और निर्वाचन अधिकारी की निष्पक्षता पर भरोसा हो। सबसे महत्वपूर्ण यह कि हारने वाला उम्मीदवार भी परिणाम के बाद यह कह सके कि फैसला उसके खिलाफ जरूर गया, लेकिन प्रक्रिया निष्पक्ष थी।

इसलिए अजमेर के 30-30 से 40-40 तक के सफर पर सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या चुनावी प्रक्रिया जनता के भरोसे को सुरक्षित रख पा रही है और अगर नहीं, तो आखिर कब तक? जनता वोट दे, प्रतिनिधि मतदान करें, फिर किसी एक वोट या पर्ची से फैसला हो—यह व्यवस्था नियमों में हो सकती है, लेकिन व्यवस्था की असली परीक्षा तब है जब वह अपने हर कदम का जवाब देने के लिए तैयार रहे।

पर्ची से कुर्सी मिल सकती है, लेकिन लोकतंत्र का भरोसा पर्ची से नहीं मिलता। भरोसा पारदर्शिता से मिलता है। अजमेर की जनता को किसी दल के पक्ष या विपक्ष में फैसला नहीं चाहिए; उसे सिर्फ इतना जानना है कि फैसला हुआ कैसे। क्योंकि सवाल आज यह नहीं कि कौन जीता—सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र इस चुनावी प्रक्रिया से सुरक्षित रह पाएगा और अगर सवाल लगातार उठते रहे तो आखिर कब तक?

।

One thought on “अजमेर: 30-30 से 40-40 तक… सिस्टम पर अतिक्रमण या सियासत का संजोग?”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *