लेखक:- देवेन्द्र सक्सैना
नगर निकाय चुनाव नज़दीक आते ही शहर में एक बार फिर वही पुराना मौसम लौट आया है। गलियों में विकास की चर्चा कम और “टिकट किसे मिलेगा?” की फुसफुसाहट ज़्यादा सुनाई देने लगी है। वर्षों तक जनता के बीच न दिखने वाले कई चेहरे अचानक पार्टी कार्यालयों के चक्कर काटते नज़र आते हैं। किसी की सुबह नेताओं के दरबार में शुरू होती है तो किसी की शाम सिफारिशों की चौखट पर खत्म।
ऐसा लगता है मानो शहर का विकास जनता नहीं, बल्कि पार्टी का एक टिकट तय करेगा।
विडंबना यह है कि जो नेता चुनाव लड़ने से पहले ही पार्टी के सामने नतमस्तक हो जाता है, उससे चुनाव जीतने के बाद जनता के सामने मजबूती से खड़े होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? टिकट की कीमत चुकाने वाला नेता अक्सर जनता का नहीं, टिकट देने वालों का एहसान चुकाने में व्यस्त रहता है।
अगर किसी व्यक्ति को सचमुच अपने शहर की चिंता है, यदि उसे विश्वास है कि जनता उसके साथ है, तो उसे चुनाव से पहले ही राजनीतिक दलों की बैसाखी छोड़ देनी चाहिए। निर्दलीय मैदान में उतरे, जनता के वोट से जीते और फिर देखिए कैसे वही राजनीतिक दल उसके दरवाज़े पर दस्तक देंगे।
यह भी पढ़ें :
लोकतंत्र में सबसे बड़ा हाईकमान जनता होती है, कोई पार्टी कार्यालय नहीं। जो नेता जनता के दम पर जीतकर आता है, उसकी आवाज़ भी बुलंद होती है और उसका आत्मसम्मान भी सुरक्षित रहता है। ऐसे जनप्रतिनिधि विकास के लिए किसी पार्टी की कृपा पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि पार्टियाँ भी उनके साथ खड़े होने को मजबूर होती हैं।
शहर को आज ऐसे प्रतिनिधियों की ज़रूरत है जो टिकट के लिए नहीं, जनता के भरोसे के लिए संघर्ष करें। क्योंकि जब तक टिकट की राजनीति हावी रहेगी, तब तक शहर का विकास फाइलों में और नेता पार्टी कार्यालयों की सीढ़ियों पर ही दिखाई देंगे।
अब फैसला जनता और संभावित उम्मीदवारों दोनों को करना है—क्या वे टिकट के पीछे दौड़ेंगे या जनता का विश्वास जीतकर राजनीतिक दलों को अपने पीछे चलने पर मजबूर करेंगे?
शहर तभी बदलेगा, जब नेता टिकट के नहीं, जनता के उम्मीदवार बनेंगे ।
