बेटियों को काबिल बनाया, लेकिन अंतिम विदाई में कोई नहीं पहुंचा: वीडियो कॉल पर हुआ पिता का अंतिम संस्कार

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नईदिल्ली सोनीपत, 6 अगस्त 2026। (प्र.सा.)हरियाणा के सोनीपत से रिश्तों के बदलते स्वरूप और बुजुर्गों की उपेक्षा की एक बेहद भावुक कर देने वाली घटना सामने आई है। मुंबई के पूर्व टेक्सटाइल व्यापारी शिवचरण राम रतन गुप्ता का लंबी बीमारी के बाद सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में निधन हो गया। जीवनभर अपनी तीन बेटियों की शिक्षा, पालन-पोषण और विवाह में सब कुछ न्योछावर करने वाले शिवचरण गुप्ता की अंतिम यात्रा में उनकी एक भी बेटी शामिल नहीं हुई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, तीनों बेटियों ने केवल वीडियो कॉल के माध्यम से अपने पिता का अंतिम संस्कार देखा और अंतिम संस्कार के खर्च के लिए ₹5,100 भेजे।

शिवचरण राम रतन गुप्ता मूल रूप से मुंबई के निवासी थे और टेक्सटाइल कारोबार से जुड़े रहे थे। बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण वे लगभग दो वर्ष पहले अपनी पत्नी मीना गुप्ता के साथ सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में रहने आ गए थे। कुछ समय पहले उनकी पत्नी का भी वहीं निधन हो गया था। पत्नी के निधन के बाद शिवचरण गुप्ता अकेले ही वृद्धाश्रम में रह रहे थे और लगातार बीमार चल रहे थे।

वृद्धाश्रम के संचालकों के अनुसार, शिवचरण गुप्ता अपनी बेटियों से मिलने की इच्छा अक्सर व्यक्त करते थे। उनकी तीनों बेटियां क्रमशः नेपाल, उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और मुंबई में रहती हैं। पिता की गंभीर हालत की जानकारी उन्हें पहले से दी गई थी, लेकिन वे अंतिम समय में भी उनसे मिलने नहीं पहुंचीं। निधन के बाद जब अंतिम संस्कार की तैयारी की गई, तब भी किसी बेटी ने आने में असमर्थता जताई।

इसके बाद वृद्धाश्रम के कर्मचारियों, स्थानीय लोगों और समाजसेवियों ने मिलकर शिवचरण गुप्ता की अंतिम यात्रा निकाली और पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार कराया। इस दौरान बेटियां वीडियो कॉल से जुड़ी रहीं और उसी माध्यम से पिता के अंतिम दर्शन किए।

यह घटना सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद व्यापक चर्चा का विषय बन गई है। कई लोगों ने इसे आधुनिक जीवन की व्यस्तता और पारिवारिक रिश्तों में बढ़ती संवेदनहीनता का उदाहरण बताया, जबकि कुछ लोगों ने यह भी कहा कि परिवार की पूरी परिस्थितियां सार्वजनिक नहीं हैं, इसलिए किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी तथ्यों को जानना आवश्यक है।

यह घटना एक बार फिर समाज के सामने यह सवाल खड़ा करती है कि क्या आर्थिक सहायता भर से संतान का दायित्व पूरा हो जाता है, या बुजुर्ग माता-पिता को जीवन के अंतिम क्षणों में अपने बच्चों की उपस्थिति, अपनापन और भावनात्मक सहारा भी उतना ही आवश्यक है।

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