ओडिशा में 37 लाख से अधिक लोग प्रभावित, बिहार में लाखों की आबादी बाढ़ की चपेट में, असम में 12 लाख से ज्यादा प्रभावित—नेपाल की त्रासदी ने हिमालयी क्षेत्र में खतरा दिखाया
नई दिल्ली/भुवनेश्वर/पटना/गुवाहाटी। (विशेष रिपोर्ट) देश के कई हिस्सों में लगातार बदलता मौसम ,बाढ़, जलभराव, नदी के बढ़ते जलस्तर, तेज हवाएं, गरज-चमक और कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा ने प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
26 सितंबर को भारत मौसम विज्ञान विभाग ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में बहुत भारी वर्षा की संभावना जताई है। बिहार, ओडिशा सहित कई राज्यों में भारी बारिश, गरज-चमक और बिजली गिरने की स्थिति बन सकती है। असम और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भी गरज-चमक की गतिविधियां जारी रहने का पूर्वानुमान है।
ओडिशा का आंकड़ा चेतावनी देने के लिए काफी है
ओडिशा में इस वर्ष बाढ़ और भारी बारिश का प्रभाव अभी तक है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार 26 जिलों में 37,43,943 लोग प्रभावित, सात मौतें और 93 पशुधन के नुकसान की सूचना दी गई। लगभग 2,12,533 हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ और 18,067 मकान क्षतिग्रस्त बताए गए हैं।
यह केवल राहत और पुनर्वास का आंकड़ा नहीं है। यह आंकड़ा आने वाले महीनों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसान की आय, पशुचारे और स्थानीय खाद्य आपूर्ति पर पड़ने वाला असर है।
सितंबर के अंतिम सप्ताह में ओडिशा और आसपास के क्षेत्रों में फिर सक्रिय मौसम ने खतरा बढ़ाया है। तेज बारिश के कारण कई स्थानों पर फ्लैश फ्लड की स्थिति बन सकती है वहीं राहत-बचाव के लिए भी सरकार को तैयार रहना होगा । समुद्र में खराब मौसम के कारण आंध्र प्रदेश की 51 मछली पकड़ने वाली नौकाओं को सुरक्षित व्यवस्था के लिए ओडिशा की ओर मोड़ा गया।
बिहार में नदियों का बढ़ता पानी और खेतों की चिंता
बिहार के लिए खतरा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि राज्य की बड़ी आबादी नदी और कृषि आधारित क्षेत्रों में रहती है। इस मानसून में गंगा, गंडक, कोसी, बूढ़ी गंडक, पुनपुन और घाघरा जैसी नदियों के कई स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर बहने के कारण यहां की आबादी प्रभावित होने की रिपोर्ट सामने आई।
सितंबर के शुरुआती दौर में ही राज्य के 11 जिलों के 50 प्रखंडों की 201 पंचायतों में लगभग 10 लाख लोग प्रभावित बताए गए थे। प्रशासन ने 900 नावें, 50 मेडिकल कैंप, 19 नाव एंबुलेंस और 36 पशु चिकित्सा कैंप संचालित किए।
बाद में सितंबर के मध्य तक 14 जिलों के 2,000 से अधिक गांवों के बाढ़ से प्रभावित होने की सूचना सामने आई।
केंद्र सरकार ने बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाकों का जमीनी और हवाई आकलन कराया है तथा राहत एवं कृषि नुकसान क समीक्षा की है।
बिहार के लिए चेतावनी साफ है—पानी उतरना संकट का अंत नहीं है। खेतों में जमा गाद, सड़ती फसल, पशुचारे की कमी, बीज की समस्या और अगली फसल की तैयारी का खर्च किसान की आर्थिक स्थिति पर लंबा असर डाल सकता है।
असम में बाढ़ का लंबा असर
असम में इस वर्ष बाढ़ से 12 लाख से अधिक लोग 25 जिलों में प्रभावित होने की रिपोर्ट सामने आई थी और 3 सितंबर तक 108 मौतें दर्ज की गई थीं। लगभग 6,477 हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित बताया गया।
पूर्वोत्तर की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यहां भारी वर्षा के बाद नदी, पहाड़ी बहाव, भूस्खलन और जलभराव का खतरा और बढ़ गया है। इसलिए केवल नदी के जलस्तर पर नजर रखना पर्याप्त नहीं होगा।
नेपाल की त्रासदी भारत के लिए भी चेतावनी
नेपाल और चीन के सीमावर्ती हिमालयी क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन ने पूरे हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता सामने रखी है। हालिया रिपोर्टों में 1,400 से अधिक मौतों और 6,000 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है।
इस त्रासदी को भारत में वैसी ही आपदा आने की भविष्यवाणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन हिमालयी क्षेत्र, नेपाल के जलग्रहण क्षेत्र और नीचे स्थित बिहार-उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए सीमा-पार वर्षा और नदी तंत्र की निगरानी को और मजबूत करना जरूरी है।
अब सबसे बड़ा सवाल—खेतों का क्या होगा?
बाढ़ में सड़क और मकान का नुकसान दिखाई देता है, लेकिन खेत का नुकसान कई बार पानी उतरने के बाद सामने आता है।
धान, मक्का, दलहन, सब्जियां और चारा यदि लंबे समय तक पानी में रहें तो उत्पादन और गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। लगातार नमी के कारण फसल रोग और कीट प्रकोप की संभावना भी बढ़ सकती है।
अभी पूरे भारत में खाद्यान्न संकट नहीं है। लेकिन यदि अलग-अलग राज्यों में बार-बार बाढ़ और अत्यधिक वर्षा से फसल प्रभावित होती रही, तो कुछ क्षेत्रों में मंडी आवक, सब्जियों, पशुचारे और स्थानीय खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
सरकारों के लिए अब तैयारी का समय
राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के सामने अब केवल राहत शिविर चलाने की चुनौती नहीं है। जरूरत है कि अगले चरण की तैयारी पानी आने से पहले की जाए।
सरकारों को तत्काल पांच मोर्चों पर विशेष निगरानी बढ़ानी चाहिए—
पहला—फसल सर्वे। प्रत्येक प्रभावित जिले में खेतवार नुकसान का डिजिटल सर्वे कराकर किसानों की वास्तविक स्थिति दर्ज की जाए।
दूसरा—बीज और खाद की तैयारी। यदि बड़ी मात्रा में खरीफ फसल नष्ट हुई है तो रबी की बुवाई के लिए प्रमाणित बीज, खाद और कृषि सहायता पहले से उपलब्ध कराई जाए।
तीसरा—पशुचारा। बाढ़ उतरने के बाद सबसे बड़ा संकट पशुधन के चारे और पशु रोगों का हो सकता है। जिलों में चारा बैंक और पशु चिकित्सा दल तैयार रहें।
चौथा—खाद्यान्न और आवश्यक वस्तुओं का भंडारण। संभावित परिवहन बाधाओं को देखते हुए संवेदनशील जिलों में अनाज, दवाइयां और जरूरी सामान का पर्याप्त बफर स्टॉक रखा जाए।
पांचवां—नदी और बांध निगरानी। नेपाल सहित पड़ोसी क्षेत्रों के जलग्रहण क्षेत्रों, नदियों, बांधों और बैराजों से संबंधित सूचनाओं का वास्तविक समय में आदान-प्रदान मजबूत किया जाए।
26 सितंबर के बाद क्या?
26 सितंबर की IMD चेतावनियां बताती हैं कि मौसम अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ है। छत्तीसगढ़ में आज बहुत भारी बारिश और गरज-चमक की चेतावनी है, जबकि बिहार में भारी बारिश की चेतावनी जारी है। उत्तर भारत और मध्य भारत के कई हिस्सों में भी वर्षा और आंधी-तूफान की गतिविधियां बनी रह सकती हैं।
IMD का विस्तारित पूर्वानुमान भी 24 सितंबर से 7 अक्टूबर तक का है।
प्रकृति संकेत दे रही है, अब व्यवस्था को जवाब देना होगा
सरकारों के लिए संदेश साफ है—आपदा आने के बाद राहत देना जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है आपदा आने से पहले तैयारी करना।
क्योंकि पानी उतर जाने के बाद सड़क बनाई जा सकती है, मकान फिर खड़े किए जा सकते हैं, लेकिन एक किसान की पूरी फसल, उसकी छह महीने की मेहनत और अगली फसल का भरोसा वापस लाने में बहुत अधिक समय लगता है।
आज की बाढ़ को केवल आज की खबर समझना भूल होगी। यह आने वाले महीनों की कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए चेतावनी है।
अब फैसला प्रकृति नहीं, तैयारी करेगी—देश तैयार रहता है तो आपदा का नुकसान सीमित किया जा सकता है।
