पुरानी बसों पर नया रंग… ‘सुगम परिवहन’ या सरकारी धन का मेकओवर?

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भोपाल में दौड़ी बसें इंदौर में नए कलेवर के साथ उतरीं—50 से 70 हजार किमी चल चुकी बसों की फिटनेस, मरम्मत खर्च और जिम्मेदार एजेंसियों पर उठे सवाल

भोपाल/इंदौर | संवाददाता – मध्यप्रदेश में 21 साल बाद सार्वजनिक बस परिवहन सेवा नए नाम और नए कलेवर के साथ सड़कों पर लौट आई है। 25 सितंबर को भोपाल के बीएचईएल दशहरा मैदान में आयोजित राज्यस्तरीय कार्यक्रम में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा तथा पीएम ई-बस सेवा का शुभारंभ किया। दोनों नेताओं ने सात शहरों के लिए 351 इंटरसिटी और इंट्रासिटी बसों को हरी झंडी दिखाई।

पहले चरण में इंदौर में 145, भोपाल में 106, जबलपुर में 67, रीवा में 18, देवास में 10, कटनी में 3 और भिंड में 2 बसें संचालित की गई हैं। कुल 351 बसों में 120 इंटरसिटी और 231 इंट्रासिटी बसें शामिल हैं। सरकार का घोषित उद्देश्य शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाना तथा यात्रियों को सुरक्षित, सुविधाजनक और आधुनिक सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराना है।

लेकिन इस चमकदार शुरुआत के बीच इंदौर से सामने आई बसों की तस्वीर और उनकी पुरानी कहानी अब कई सवाल खड़े कर रही है।

भोपाल की सड़क से इंदौर का नया सफर

12 सितंबर को प्रकाशित एक स्थानीय रिपोर्ट में बताया गया कि इंदौर में मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के लिए भोपाल में पहले चल चुकी करीब 12 बसों को इंदौर लाकर सर्विसिंग के बाद नए कलेवर में तैयार किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें कुछ बसें भोपाल के भौरी से मंडीदीप के बीच संचालित हो चुकी थीं और 50 से 70 हजार किलोमीटर तक चल चुकी थीं। इन बसों को रंग-रोगन कर इंदौर में चलाने की तैयारी की गई। रिपोर्ट में इन बसों को वर्ष 2022-23 निर्मित बताया गया है। सवाल यह नहीं कि पुरानी बस की मरम्मत क्यों की गई। सवाल यह है कि जिस बस ने पहले ही हजारों किलोमीटर का सफर तय कर लिया, क्या केवल नया रंग, चमकदार कलेवर और कुछ आधुनिक उपकरण उसे यात्रियों के लिए उतनी ही विश्वसनीय बना देते हैं जितनी एक नई बस?

रिपोर्ट के अनुसार इन बसों में कैमरे लगाने, ऑटोमैटिक गेट, GPS ट्रैकिंग सिस्टम , फायर एक्सटिंग्विशर और LED डिस्प्ले लगाने जैसे काम किए गए।

पुरानी बस को निर्धारित मानकों के अनुसार मरम्मत करके चलाना अपने आप में अनियमितता साबित नहीं करता। लेकिन यदि सरकारी धन या सार्वजनिक संसाधनों से इन बसों को तैयार किया गया है, तो जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि कितना खर्च हुआ, किस मद में हुआ, किस एजेंसी ने काम किया और किसने गुणवत्ता की जांच की।

यदि मरम्मत का खर्च, फिटनेस और तकनीकी सुरक्षा का रिकॉर्ड सार्वजनिक है तो सवालों का जवाब स्वतः मिल सकता है। लेकिन यदि बस के बाहरी मेकओवर पर खर्च तो दिखाई देता है और उसके वास्तविक तकनीकी जीवन का रिकॉर्ड जनता से छिपा रहता है, तो सवाल और गंभीर होंगे।

जिम्मेदार विभाग और एजेंसी कौन?

योजना में मध्यप्रदेश यात्री परिवहन एवं इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (MPYPIL) तथा उसकी क्षेत्रीय सहायक कंपनियों के माध्यम से संचालन और निगरानी की व्यवस्था बताई गई है। निजी बस ऑपरेटरों की भागीदारी भी PPP मॉडल के तहत प्रस्तावित है।

इंदौर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार AICTSL ने बस ऑपरेटरों के साथ 50 प्रतिशत नई और 50 प्रतिशत पुरानी बसों के संचालन का अनुबंध किया है। संबंधित अधिकारी अर्थ जैन के हवाले से बसों की फिटनेस और सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही गई है।

इसलिए जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए—

बस किस ऑपरेटर ने उपलब्ध कराई?
उसकी फिटनेस किसने जांची?
किलोमीटर रिकॉर्ड किसने सत्यापित किया?
मरम्मत किस एजेंसी ने की?
मरम्मत की गुणवत्ता किसने प्रमाणित की?
CCTV, GPS और अन्य उपकरणों पर कितना खर्च हुआ?
और सेवा में लगाने से पहले अंतिम तकनीकी अनुमति किस स्तर पर दी गई?

‘हाईटेक’ बस में पुरानी तकनीकी खामियां तो नहीं?

सरकार ने नई सेवा में CCTV, पैनिक बटन, व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग और ITMS आधारित रियल-टाइम निगरानी जैसी सुविधाओं की घोषणा की है। कमांड-कंट्रोल सेंटर के माध्यम से बसों की लोकेशन और समयबद्धता पर निगरानी की व्यवस्था की गई है।

लेकिन सरकार से सीधा सवाल है—GPS बस की लोकेशन बता सकता है, CCTV घटना रिकॉर्ड कर सकता है, लेकिन ब्रेक, टायर, इंजन, सस्पेंशन, दरवाजे और अन्य यांत्रिक हिस्सों की वास्तविक हालत कौन प्रमाणित करेगा?

सरकार ने एक महत्वाकांक्षी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की शुरुआत की है। शहरों को जोड़ना, गांवों तक बस पहुंचाना और आम आदमी को सस्ता परिवहन उपलब्ध कराना निश्चित रूप से बड़ी जिम्मेदारी है। लेकिन नई योजना का अर्थ केवल नया नाम और नया रंग नहीं होना चाहिए।

यदि पुरानी बसें निर्धारित मानकों पर फिट हैं तो सरकार को यह तथ्य सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए। इससे भ्रम भी दूर होगा और व्यवस्था पर भरोसा भी बढ़ेगा।

क्योंकि—रंग नया हो सकता है, बस का इतिहास नहीं।
LED नई हो सकती है, पुराने किलोमीटर नहीं।
CCTV नया हो सकता है, लेकिन सुरक्षा की जिम्मेदारी पुरानी ही रहेगी। 

अब सरकार से आखिरी सवाल

यदि जांच में यह पाया जाता है कि किसी बस को नियमों के विपरीत सेवा में लगाया गया, फिटनेस में लापरवाही हुई, सरकारी धन का अनुचित इस्तेमाल हुआ या अधिकारियों ने निरीक्षण में अनदेखी की—तो क्या संबंधित अधिकारी और जिम्मेदार एजेंसी पर कार्रवाई होगी?

या फिर—

“फाइल बनेगी, जांच बैठेगी, रिपोर्ट आएगी… और मामला किसी पुरानी भ्रष्टाचार की फाइल की तरह सरकारी अलमारी में दब जाएगा?”

जनता को इसका जवाब चाहिए।

क्योंकि ‘सुगम परिवहन’ का असली अर्थ बसों का चमकना नहीं, यात्रियों का सुरक्षित पहुंचना है।

जवाबदेही आखिर किसकी है ?

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