
पर्ची में ‘स्नेक बाइट’ लिखे जाने से मचा हड़कंप, घर पहुंचकर कागज देखा तो उड़ गए 18 वर्षीय युवक के होश; दोबारा अस्पताल पहुंचकर जताई आपत्ति
रीवा। संजय गांधी अस्पताल एक बार फिर इलाज व्यवस्था को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में है। जच्चा-बच्चा की मौत और अन्य विवादित मामलों के बीच अब अस्पताल में उपचार से जुड़ी ऐसी चूक सामने आई है, जिसने मरीजों की सुरक्षा और चिकित्सकीय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि कुत्ते के काटने के बाद उपचार के लिए पहुंचे 18 वर्षीय युवक को एंटी रेबीज वैक्सीन की जगह एंटी स्नेक वेनम इंजेक्शन लगा दिया गया।मामला रामपुर कोठी झिरिया निवासी आयुष सिंह (18), पिता अंशुमान सिंह से जुड़ा बताया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, पांच सितंबर की शाम कुत्ते के काटने के बाद आयुष उपचार के लिए संजय गांधी अस्पताल के कैजुअल्टी वार्ड पहुंचा था। अस्पताल पहुंचने के बाद उसने नियमानुसार पर्ची बनवाई और ड्यूटी पर मौजूद महिला पीजी डॉक्टर को स्पष्ट रूप से बताया कि उसे कुत्ते ने काटा है और एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाना है।यहीं से मामले में कथित चिकित्सकीय लापरवाही का सिलसिला सामने आता है। मरीज का दावा है कि उसकी बताई गई जानकारी के बावजूद उपचार संबंधी पर्ची में ‘डॉग बाइट’ के स्थान पर ‘स्नेक बाइट’ दर्ज कर दिया गया। इसके बाद पर्ची के आधार पर स्टाफ नर्स ने उसे एंटी स्नेक वेनम का इंजेक्शन भी लगा दिया।इंजेक्शन लगने के बाद आयुष अस्पताल से घर चला गया। उस समय उसे अंदाजा भी नहीं था कि उसके इलाज की पर्ची में क्या दर्ज किया गया है। घर पहुंचने के बाद जब उसने पर्ची को ध्यान से देखा तो उसमें एंटी स्नेक वेनम लिखा हुआ था। यह देखकर युवक और उसके परिजन घबरा गए और वह तत्काल दोबारा अस्पताल पहुंचा।मामला सामने आते ही अस्पताल में भी हलचल बढ़ गई। एक मरीज के अनुसार, जब उसने उपचार के लिए पहुंचते समय चिकित्सकीय स्टाफ को स्पष्ट तौर पर कुत्ते के काटने की जानकारी दी थी, तो फिर पर्ची में सांप के काटने का उल्लेख कैसे हुआ और उसी आधार पर दूसरा इंजेक्शन कैसे लगा—यह सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आया1 है।यह घटना महज एक सामान्य गलती मानकर नजरअंदाज किए जाने वाली नहीं है। अस्पताल में आने वाला मरीज चिकित्सकीय स्टाफ की विशेषज्ञता और सावधानी पर भरोसा करता है। ऐसे में काटने वाले जानवर की स्पष्ट जानकारी दिए जाने के बावजूद उपचार संबंधी दस्तावेज में दूसरी स्थिति दर्ज होना और उसी आधार पर दवा या इंजेक्शन दिया जाना अस्पताल की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।अब सवाल यह भी है कि मरीज की पर्ची तैयार करने से लेकर इंजेक्शन लगाने तक किसी स्तर पर इस गलती की जांच क्यों नहीं हुई। क्या इंजेक्शन देने से पहले मरीज की समस्या और पर्ची का मिलान नहीं किया गया? क्या इंजेक्शन लगाने वाले स्टाफ ने दवा का नाम और उसकी जरूरत की पुष्टि नहीं की? और सबसे महत्वपूर्ण—इस कथित लापरवाही के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी?संजय गांधी अस्पताल में सामने आए इस नए मामले ने एक बार फिर अस्पताल की व्यवस्थाओं की निगरानी और मरीजों की सुरक्षा को लेकर बहस छेड़ दी है। अब निगाहें अस्पताल प्रबंधन की जांच और कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि मामले में लापरवाही प्रमाणित होती है तो जिम्मेदार चिकित्सकीय एवं पैरामेडिकल स्टाफ पर क्या कार्रवाई की जाती है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम ने अस्पताल आने वाले मरीजों के बीच चिंता जरूर बढ़ा दी है। इलाज में एक छोटी-सी चिकित्सकीय चूक भी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है—ऐसे में इस मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।
