ग्रामीण न्याय व्यवस्था उपेक्षित, कॉर्पोरेट अदालतों को प्राथमिकता

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सभी राज्यों में ग्राम न्यायालय अधिनियम-2008 लागू करने की राष्ट्रीय वेबीनार में उठी मांग


नई दिल्ली/रीवा। देश में ग्रामीण और शहरी न्याय व्यवस्था के बीच बढ़ती असमानता पर चिंता व्यक्त करते हुए विशेषज्ञों ने कहा है कि कॉर्पोरेट विवादों के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस वाणिज्यिक अदालतों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय की पहुंच आज भी बेहद सीमित है। यह बात रविवार को आयोजित 310वें राष्ट्रीय साप्ताहिक वेबीनार में सामने आई।
वेबीनार में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति आदित्य नाथ मित्तल एवं न्यायमूर्ति कमलेश्वर नाथ, पूर्व मध्यप्रदेश राज्य सूचना आयुक्त राहुल सिंह तथा अन्य विशेषज्ञों ने ग्राम न्यायालय अधिनियम-2008 के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता पर जोर दिया।


वक्ताओं ने बताया कि देश में प्रस्तावित लगभग 6,000 ग्राम न्यायालयों के मुकाबले केवल 264 न्यायालय ही सक्रिय हैं। इसके विपरीत, कमर्शियल कोर्ट्स को पर्याप्त बजट, तकनीकी संसाधन और प्रशासनिक समर्थन उपलब्ध कराया जा रहा है। विशेषज्ञों ने इसे ग्रामीण और शहरी नागरिकों के बीच न्यायिक पहुंच की बढ़ती खाई का प्रतीक बताया।
पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि गांवों में न्यायिक ढांचे की कमजोरी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण आम नागरिक वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करने को मजबूर हैं। उन्होंने मध्यस्थता, सुलह और पंचायत आधारित विवाद निस्तारण तंत्र को मजबूत करने की वकालत करते हुए कहा कि अधिकांश ग्रामीण विवाद स्थानीय स्तर पर ही सुलझाए जा सकते हैं।
कार्यक्रम में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए आरटीआई और डिजिटल गवर्नेंस के उपयोग पर भी बल दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि जब तक ग्राम न्यायालयों को पर्याप्त संसाधन और सरकारी प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तब तक ग्रामीण भारत को सस्ता, सुलभ और त्वरित न्याय उपलब्ध कराना कठिन रहेगा।
वेबीनार का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने किया। कार्यक्रम में प्रवीण पटेल, वीरेंद्र कुमार ठक्कर, हिदायत परमार, देवेंद्र अग्रवाल सहित देशभर से सैकड़ों प्रतिभागी शामिल हुए।

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