होर्मुज संकट का असर: भारत में पेट्रोल ₹18 और डीजल ₹35 तक महंगा होने के आसार

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नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते ईरान-अमेरिका तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक कच्चे तेल बाजार में उथल-पुथल मच गई है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई हैं, जिससे भारत में भी ईंधन संकट के संकेत मिलने लगे हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, सप्लाई चेन बाधित होने, शिपिंग और इंश्योरेंस लागत बढ़ने के कारण तेल कंपनियों पर भारी दबाव है। अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज फर्म मैक्वायरी ने चेतावनी दी है कि आने वाले समय में भारत में पेट्रोल की कीमतों में करीब ₹18 प्रति लीटर और डीजल में ₹35 प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
बताया जा रहा है कि पिछले 46 दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 27 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि हुई है। युद्ध से पहले ब्रेंट क्रूड 73 डॉलर पर था, जो अब 100 डॉलर के आसपास बना हुआ है। इस तेजी ने भारत की तेल कंपनियों की आर्थिक स्थिति पर सीधा असर डाला है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन, अमेरिका, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों ने ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी कर दी है, लेकिन भारत में अभी तक आम उपभोक्ताओं को राहत दी गई है। इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड और हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड ने अप्रैल 2022 के बाद से खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है।
लेकिन इस स्थिरता की कीमत कंपनियों को भारी नुकसान के रूप में चुकानी पड़ रही है। वर्तमान में तेल कंपनियों का घाटा लगभग ₹2400 करोड़ प्रतिदिन तक पहुंच गया था। केंद्र सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी में ₹10 की कटौती के बाद भी यह नुकसान करीब ₹1600 करोड़ प्रतिदिन बना हुआ है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि पर कंपनियों का घाटा करीब ₹6 प्रति लीटर बढ़ जाता है। यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें 135 से 165 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तो भारत में ईंधन की कीमतों में बड़ी उछाल लगभग तय मानी जा रही है।
ऐसे में सवाल यही है—क्या चुनावों के बाद आम आदमी को महंगे पेट्रोल-डीजल का बड़ा झटका झेलना पड़ेगा?
अगर चाहें तो मैं इसे और ज्यादा तेज-तर्रार (कटाक्ष वाला संपादकीय) या हेडलाइन + सबहेडिंग के साथ फ्रंट पेज स्टाइल में भी बना सकता हूँ।

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