सुप्रीम कोर्ट के बहाने सनातन पर नियंत्रण ?

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प्रयागराज। (मीडिया)प्रयागराज माघ मेला प्राधिकरण द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के नाम जारी किया गया नोटिस अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई भर नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे देश में सनातन परंपराओं और धार्मिक पदों की वैधता पर प्रश्न बन गया है। यह नोटिस त्रिवेणी मार्ग, उत्तर पटरी, सेक्टर-4, माघ मेला क्षेत्र, प्रयागराज में स्थापित उनके शिविर को संबोधित करते हुए जारी किया गया, जिसमें उनसे 24 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण मांगा गया है।

घटना का संक्षिप्त कारण यह है कि माघ मेला क्षेत्र में लगाए गए शिविर, बैनर, पोस्टर और मंचीय संबोधनों के माध्यम से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को ज्योतिषपीठ बद्रीनाथ के शंकराचार्य के रूप में प्रचारित किया गया। मेला प्रशासन का कहना है कि ज्योतिषपीठ शंकराचार्य पद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सिविल अपील संख्या 3010/2020 एवं 3011/2020 अभी भी लंबित है और इस प्रकरण में वर्ष 2022 में पारित अंतरिम आदेशों के अनुसार, अंतिम निर्णय तक किसी भी व्यक्ति का पट्टाभिषेक अथवा शंकराचार्य पद पर नियुक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन प्रतिबंधित है।

प्रशासन ने नोटिस में स्पष्ट किया है कि न्यायालय के अंतिम निर्णय के अभाव में स्वयं को शंकराचार्य के रूप में प्रचारित करना अदालत के आदेशों की अवहेलना की श्रेणी में आ सकता है। इसी आधार पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से पूछा गया है कि वे किस अधिकार से शंकराचार्य पद का प्रयोग कर रहे हैं और क्या वे सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेशों से अवगत हैं।

यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े संकेत की ओर इशारा करता है। पहली बार किसी मेला प्राधिकरण ने सीधे तौर पर यह कह दिया है कि परंपरागत धार्मिक पदों की मान्यता तब तक मान्य नहीं मानी जाएगी, जब तक उस पर न्यायिक या प्रशासनिक मुहर न हो। इससे यह आशंका गहराती जा रही है कि आने वाले समय में सनातन के वे ही स्थान, मठ और पद मान्यता प्राप्त होंगे, जो सत्ता और उसके अधीन व्यवस्थाओं के दायरे में होंगे। ऐसे में सदियों से साधु-संतों द्वारा बनाए गए नियम, परंपराएं और पद अब सवालों के घेरे में खड़े दिखाई दे रहे हैं, और देश की जनता के सामने यह बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है कि आस्था की सीमा कहां खत्म होती है और सत्ता की भूमिका कहां से शुरू होती है।

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