“कॉकरोच” बयान पर देशभर में बवाल, RTI वेबीनार में सुप्रीम कोर्ट और लोकायुक्त व्यवस्था पर उठे बड़े सवाल

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रीवा, 24 मई। देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा बेरोजगार युवाओं, सोशल मीडिया कर्मियों और आरटीआई कार्यकर्ताओं को लेकर दिए गए “कॉकरोच” एवं “पैरासाइट” संबंधी कथन पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। शनिवार को आयोजित 309वें राष्ट्रीय सूचना अधिकार वेबीनार में देशभर के आरटीआई कार्यकर्ताओं, पूर्व सूचना आयुक्तों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विधि विशेषज्ञों ने इस टिप्पणी को लेकर गंभीर चिंता जताई। वक्ताओं ने कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के शब्द लोकतंत्र की दिशा तय करते हैं, ऐसे में इस प्रकार की टिप्पणी करोड़ों युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भावनाओं को आहत करती है।

वेबीनार में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन लोकायुक्त मध्यप्रदेश बनाम पूर्व पुलिस निरीक्षक कामता प्रसाद मिश्रा प्रकरण पर भी विस्तार से चर्चा हुई। बताया गया कि यह मामला लोकायुक्त संगठन द्वारा आरटीआई के तहत जानकारी देने से इनकार किए जाने से जुड़ा है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सवाल उठाए थे कि “क्या लोकायुक्त कोई खुफिया एजेंसी है” जिसे सूचना देने से छूट प्राप्त हो।

कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट शिवानंद द्विवेदी ने किया। तीन घंटे चले इस राष्ट्रीय वेबीनार में देश के विभिन्न राज्यों से सैकड़ों प्रतिभागी ऑनलाइन जुड़े।

“युवाओं को कॉकरोच कहना दुर्भाग्यपूर्ण”

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गुजरात से जुड़ी आरटीआई कार्यकर्ता एवं समाजसेवी ने कहा कि बेरोजगार युवाओं को “कॉकरोच” या “परजीवी” कहना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि देश की बड़ी युवा आबादी पहले ही बेरोजगारी और सामाजिक चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे में इस तरह की टिप्पणियां उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती हैं। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को भाषा और शब्दों की मर्यादा का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

लोकायुक्त को जानकारी देने से नहीं बचना चाहिए : राहुल सिंह

मध्यप्रदेश के पूर्व राज्य सूचना आयुक्त ने वेबीनार में कहा कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने लोकायुक्त से जुड़े कई मामलों में सूचना उपलब्ध कराने के आदेश दिए थे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि लोकायुक्त जैसी संस्थाएं पूरी तरह गोपनीय एजेंसी नहीं हैं और कुछ विशेष सूचनाओं को छोड़कर अधिकांश जानकारियां आरटीआई के तहत दी जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतंत्र की मूल आत्मा है तथा सूचना छिपाने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करती है। साथ ही उन्होंने मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे बयान समाज में नकारात्मक संदेश देते हैं।

“6 करोड़ लंबित मामलों पर हो ध्यान”

छत्तीसगढ़ में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता एवं फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के कन्वीनर ने कहा कि देश में न्यायिक लंबित मामलों की संख्या लगभग 6 करोड़ तक पहुंच चुकी है। ऐसे में न्याय व्यवस्था की प्राथमिकता मामलों का त्वरित निराकरण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि बयानबाजी से न्याय व्यवस्था की छवि कमजोर होती है और जनता का भरोसा प्रभावित होता है।

“मुझे गलत तरीके से फंसाया गया” : कामता प्रसाद मिश्रा

पूर्व पुलिस निरीक्षक ने वेबीनार में दावा किया कि उन्हें शराब माफिया और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने के कारण लोकायुक्त ट्रैप में फंसाया गया। उन्होंने कहा कि सात वर्ष बीत जाने के बाद भी मामले में चालान प्रस्तुत नहीं किया गया।

मिश्रा ने बताया कि स्वयं को निर्दोष साबित करने के लिए उन्होंने लोकायुक्त से आरटीआई के तहत दस्तावेज मांगे थे, लेकिन जानकारी देने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद मामला सूचना आयोग और फिर हाईकोर्ट पहुंचा, जहां जानकारी देने के आदेश हुए तथा संबंधित अधिकारियों पर पांच हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया।

उन्होंने बताया कि बाद में लोकायुक्त इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां न्यायालय ने सुनवाई के दौरान पूछा कि क्या लोकायुक्त को धारा 24 के तहत कोई विशेष छूट प्राप्त है। मामले में फिलहाल आदेश सुरक्षित रखा गया है।

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देशभर से जुड़े आरटीआई कार्यकर्ता

कार्यक्रम में उत्तराखंड के आरटीआई रिसोर्स पर्सन ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से लोकायुक्त अधिनियम, आरटीआई कानून और न्यायिक व्यवस्था की संरचना पर विस्तृत जानकारी दी। वेबीनार में देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़े आरटीआई कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने भी अपने विचार रखे।

स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट, रीवा (मध्यप्रदेश)

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