अजमेर फिर एक नए “ड्रीम प्रोजेक्ट” के साथ सुर्खियों में है। करीब 70 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले अत्याधुनिक कन्वेंशन सेंटर का शिलान्यास कर शहर को आधुनिकता की नई उड़ान देने के दावे किए जा रहे हैं। मंचों पर तालियां हैं, भाषणों में “वैश्विक पहचान” है, और पोस्टरों में चमकता हुआ भविष्य।
लेकिन शहर की गलियों में खड़ा आम आदमी पूछ रहा है —
“साहब, पहले पुरानी रोशनियों का हिसाब तो दे दो…”
लाइटों की राजनीति और अंधेरे में जनता
हाल ही में एक फोटो वायरल हुई, जिसमें अजमेर के विधायक और नगर निगम के अभियंता शहर को “चमकाने” के लिए लाइटिंग पर चर्चा करते दिखाई दिए। फोटो देखकर ऐसा लगा मानो पेरिस को मात देने की तैयारी चल रही हो।
मगर जनता पूछ रही है —
सागर विहार से वैशाली नगर तक बने पाथवे की लाइटें आखिर गई कहाँ?
कैमरे कहाँ हैं?,रखरखाव किसने किया?,और करोड़ों खर्च होने के बाद आज अंधेरे में कौन जवाब देगा? विडंबना देखिए…जिस क्षेत्र को बीजेपी कार्यकर्ताओं का गढ़ कहा जाता है, वहीं जनता टॉर्च लेकर विकास खोज रही है।ऐसा लग रहा है कि अजमेर में विकास का नया फॉर्मूला बन चुका है –
“पहले लाइट लगाओ, फिर लाइट गायब करो, फिर नई लाइट का टेंडर निकालो।”
क्या कन्वेंशन सेंटर भी “सेवन वंडर” बनने जा रहा है?
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शहर के लोग अब सवाल पूछने लगे हैं कि क्या यह कन्वेंशन सेंटर वास्तव में जनता की जरूरत है या फिर सिर्फ़ एक और चमकदार परियोजना?
क्योंकि अजमेर पहले भी सपनों के भारी-भरकम पोस्टर देख चुका है।
स्मार्ट सिटी,
सेवन वंडर,
सूचना केंद्र,
जवाहर रंगमंच,
और कई ऐसे प्रोजेक्ट जिनके उद्घाटन बड़े हुए लेकिन अंत झाड़ियों और टूटती दीवारों में हुआ।
आज भी कई अधूरे प्रोजेक्ट विकास की राह नहीं, बल्कि सरकारी उदासीनता की कब्रगाह बने खड़े हैं।
जनता तंज कस रही है —
“अजमेर में प्रोजेक्ट पूरे कम होते हैं, शिलान्यास ज्यादा।”
अजमेर की जनता को पानी,शिक्षा,स्वास्थ्य चाहिए या एयरकंडीशंड भाषण हॉल ?
यह सवाल अब और तेज हो रहा है कि आखिर अजमेर की प्राथमिकता क्या है? क्या शहर को एक और आलीशान भवन चाहिए? या बेहतर अस्पताल?
सरकारी स्कूल?
पेयजल?
टूटी सड़कें?
युवाओं के लिए रोजगार?क्यों हर बार करोड़ों रुपए जमीन और निर्माण आधारित योजनाओं पर ही खर्च होते हैं?
जनता पूछ रही है —
अजमेर में जलमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और शिक्षा मंत्री गायब,वहीं भूमि और निर्माण से जुड़े मंत्री जी कई चक्कर लगा चुके है? ऐसा लगता है जैसे शहर में विकास का मतलब अब सिर्फ़ भू माफियाओं की जमीनों की दलाली बन कर रह गया “सीमेंट और टाइल्स” के बढ़ते क्षेत्र से अजमेर की प्राकृतिक आबो हवा समाप्त होती जा रही।
फंड कहाँ गए? जनता ऑडिट मांग रही है
अब शहर में मांग उठ रही है कि केंद्र सरकार अजमेर में पिछले 5 वर्षों के विकास कार्यों की उच्चस्तरीय ऑडिट कराए।
सवाल साफ है —
सांसद से लेकर पार्षद तक के फंड आखिर खर्च कहाँ हुए?
अगर हजारों करोड़ रुपए आए तो शहर की कौनसी सड़क बदली?
कौनसी नाली सुधरी?
कौनसा अस्पताल विश्वस्तरीय हुआ?
कौनसे सरकारी स्कूल आधुनिक बने?
या फिर पैसा सिर्फ़ बोर्ड बदलने, रंगरोगन और टेंडर की राजनीति में बह गया?
विकास या जमीन का खेल?
जनता यह भी पूछ रही है कि क्या हर नया प्रोजेक्ट वास्तव में विकास के लिए होता है, या पहले जमीनों को घेरने, फिर आसपास की कीमतें बढ़ाने और अंत में फायदे के खेल का हिस्सा बन जाता है?
अजमेर में पहले भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि विकास योजनाओं के आसपास जमीनों के दाम अचानक आसमान छूने लगते हैं।
फिर कुछ साल बाद वही परियोजनाएं अधूरी और विवादित दिखाई देती हैं।
यानी जनता के हिस्से आता है —
धूल, जाम और अधूरा निर्माण।
और कुछ लोगों के हिस्से आता है —
“विकास का लाभ।”
अब फैसला जनता को करना है
अजमेर की जनता को अब तय करना होगा कि उसे कैसा विकास चाहिए —
तड़क-भड़क वाला विकास?
जहाँ आम आदमी सिर्फ़ बाहर से फोटो खिंचवा सके।
या बुनियादी विकास?
जहाँ बच्चे अच्छे स्कूल जाएँ,
बीमार को इलाज मिले,
सड़क पर रोशनी हो,
और जनता को अपने ही शहर में सम्मान से जीने का अधिकार मिले।
केंद्र सरकार से जनता की मांग
आज जरूरत सिर्फ़ नए शिलान्यासों की नहीं, बल्कि जवाबदेही की है।
केंद्र सरकार को अजमेर में चल रही परियोजनाओं, फंड उपयोग और अधूरे विकास कार्यों की निगरानी के लिए विशेष समिति बनानी चाहिए।
क्योंकि अगर वही लोग विकास की कहानी लिखेंगे जिन्होंने पुराने सपनों को अधूरा छोड़ा, तो डर यही है कि आने वाले समय में यह कन्वेंशन सेंटर भी किसी दिन झाड़ियों के बीच खड़ा मिलेगा…
और उसके बाहर लगा बोर्ड शायद यही कहेगा —
