माता-पिता अपने बच्चों को अक्सर कहते हैं—पढ़ो, लिखो, आगे बढ़ो और देश का भविष्य बनो। लेकिन आज देश के सामने दो तस्वीरें हैं, जो इस सवाल को और गहरा कर देती हैं कि आखिर हमारे पढ़े-लिखे युवा किस दिशा में जा रहे हैं और राजनीति उन्हें किस दिशा में ले जा रही है?
एक तस्वीर अजमेर के आनासागर की है। हाथों में झाड़ू लिए युवा, शहर के नागरिक और आम लोग नेताजी के साथ सफाई अभियान का हिस्सा बन रहे हैं। कोई कीचड़ में उतर रहा है, कोई तस्वीर खिंचवा रहा है, कोई तालाब को बचाने की उम्मीद में अपना योगदान दे रहा है। यहां जनता नेताजी के साथ है—क्योंकि मुद्दा उनका अपना शहर, अपनी झील और अपना भविष्य है।
और दूसरी तस्वीर दिल्ली की है।
वहां देश के शिक्षित युवा आंदोलन के मैदान में हैं। वे सवाल पूछ रहे हैं, जवाब मांग रहे हैं और अपने भविष्य को लेकर सड़कों पर खड़े हैं। लेकिन तस्वीर में एक अजीब विरोधाभास भी दिखाई देता है—जनता के बीच अभियान में नजर आने वाले नेताजी और शिक्षित युवाओं के आंदोलन के बीच एक दूरी।
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यही दूरी आने वाले समय का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बन सकती है।
क्योंकि युवा अब केवल यह नहीं पूछेगा कि किसने झाड़ू उठाई?
वह यह भी पूछेगा कि किसने हमारी आवाज सुनी?
जनता अब केवल फोटो में नेताजी के साथ खड़े होने से संतुष्ट नहीं होगी। वह पूछेगी—आनासागर साफ करने के लिए हमें खुद क्यों उतरना पड़ा? वर्षों से जिम्मेदार विभाग क्या कर रहे थे? और जब युवा अपने भविष्य के लिए आंदोलन करता है, तब उसके साथ कौन खड़ा होता है?
राजनीति में कैमरे के सामने जनता के साथ खड़ा होना आसान है, लेकिन जनता के कठिन सवालों के सामने खड़ा होना असली परीक्षा है।
आज की ये तस्वीरें केवल आज की खबर नहीं हैं। ये आने वाले कल का संकेत हैं।
जो युवा आज आनासागर की गंदगी साफ करने के लिए घर से निकला है, वही कल व्यवस्था से सवाल पूछने के लिए भी निकल सकता है। जो युवा आज दिल्ली में अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहा है, वह कल मतदान केंद्र पर भी अपनी ताकत दिखा सकता है।
और यही वह बिंदु है जहां सत्ता और नेताओं को सावधान होने की जरूरत है।
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क्योंकि जागरूक युवा जब झाड़ू उठाता है तो शहर साफ करता है, लेकिन जब वही युवा सवाल उठाता है तो राजनीति का चेहरा बदल सकता है।
नेताओं को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि जनता हमेशा अभियान का हिस्सा बनकर केवल तालियां बजाती रहेगी। जनता आज साथ चल रही है, कल सवाल भी पूछेगी। और अगर सवालों के जवाब नहीं मिले, तो इतिहास गवाह है—जनता पहले तस्वीर बदलती है, फिर व्यवस्था।
आज आनासागर के किनारे खड़ा युवा शायद सिर्फ झील की सफाई कर रहा है…
लेकिन लोकतंत्र की गहराई में देखें तो एक नई राजनीतिक चेतना भी आकार ले रही है।
नेताजी, तस्वीरें संभालकर रखिए… क्योंकि आने वाला समय तस्वीरें नहीं, हिसाब देखेगा।
