जनता जागेगी तो राजनीति बदलेगी, वरना लोकतंत्र के मंच पर दबंगई का तमाशा चलता रहेगा
विशेष संपादकीय | Khabar One News
नगर निगम, नगर परिषद और पंचायत—यही वे संस्थाएं हैं जहां लोकतंत्र की असली परीक्षा होती है। यहीं से जनता के रोजमर्रा के सवाल उठते हैं और यहीं से तय होता है कि सड़क कैसी होगी, नालियां साफ होंगी या नहीं, पानी मिलेगा या नहीं, सफाई व्यवस्था सुधरेगी या नहीं और विकास की योजनाओं का लाभ आम नागरिक तक पहुंचेगा या नहीं। लेकिन दुर्भाग्य से स्थानीय राजनीति का एक चेहरा ऐसा भी सामने आ रहा है, जहां जनसेवा के बजाय शक्ति प्रदर्शन, भीड़, दबंगई और दिखावे को राजनीतिक प्रभाव का पैमाना बनाने की कोशिश होती दिखाई देती है।
नेता के साथ जनता है या सिर्फ हुजूम?
राजनीति में भीड़ नई बात नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि किसी नेता की ताकत उसके साथ खड़े ईमानदार और जागरूक नागरिकों से तय होगी या फिर ऐसे लोगों की संख्या से, जिनका इस्तेमाल केवल शक्ति प्रदर्शन के लिए किया जाए? अगर किसी नेता को अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने के लिए बड़ी भीड़, दबंग चेहरों और बाहुबल के प्रदर्शन की जरूरत पड़ रही है, तो लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा सवाल और क्या हो सकता है? नेता की पहचान इस बात से होनी चाहिए कि उसने जनता के लिए कितनी आवाज उठाई, कितनी समस्याएं हल कराईं और कितनी बार जनता के बीच खड़ा दिखाई दिया। केवल काफिले, नारे और भीड़ किसी को जननेता नहीं बनाते।
गाड़ियों के काफिले से नहीं, काम से बनता है नेता
आज राजनीति में एक अजीब प्रतियोगिता दिखाई देती है—किसका काफिला बड़ा है, किसके स्वागत में ज्यादा लोग पहुंचे, किसके पोस्टर सबसे बड़े हैं और किसका शक्ति प्रदर्शन सबसे ज्यादा हुआ। लेकिन आम नागरिक के सवाल इससे बिल्कुल अलग हैं। सड़क कब बनेगी? नाली कब साफ होगी? पानी की समस्या कब दूर होगी? स्ट्रीट लाइट कब जलेगी? वार्ड की समस्या सुनने कौन आएगा? गरीब और आम आदमी की आवाज कौन बनेगा? इन सवालों का जवाब पोस्टर और काफिले नहीं देते। इनका जवाब काम देता है। लोकतंत्र में नेता की सबसे बड़ी गाड़ी जनता का विश्वास होती है। बाकी काफिले तो पेट्रोल खत्म होते ही रुक जाते हैं।
भ्रष्टाचार के सवालों पर भी अगर शर्म नहीं, तो सवाल जनता से भी
राजनीति में आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना दो अलग बातें हैं। इसलिए किसी भी व्यक्ति को बिना प्रमाण दोषी ठहराना उचित नहीं। लेकिन जहां भ्रष्टाचार, अनियमितता या सत्ता के दुरुपयोग को लेकर सार्वजनिक सवाल उठते हैं, वहां जवाबदेही जरूरी है। राजनीति में पारदर्शिता का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि जनता के सवालों का जवाब देना भी है। सवाल यह भी है कि क्या सार्वजनिक जीवन में बैठे लोगों को अपने आचरण के प्रति जवाबदेह नहीं होना चाहिए? यदि किसी नेता पर गंभीर सवाल उठें और वह जवाब देने के बजाय शक्ति प्रदर्शन में जुट जाए, तो लोकतंत्र में जनता को और ज्यादा सजग होने की जरूरत है।
जनता भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती
यहां सवाल सिर्फ नेताओं से नहीं है। सवाल जनता से भी है। आखिर नेता बनाता कौन है? जनता। वोट देता कौन है? जनता। फिर पांच साल तक शिकायत कौन करता है? वही जनता। यदि कोई व्यक्ति पैसे, उपहार, दिखावे, जातीय समीकरण, व्यक्तिगत प्रभाव या दबंगई के आधार पर वोट हासिल कर लेता है और हम बिना उसके काम का मूल्यांकन किए उसे अपना प्रतिनिधि बना देते हैं, तो बाद में व्यवस्था की खराब हालत पर सवाल उठाते समय हमें अपनी भूमिका पर भी विचार करना चाहिए।
लोकतंत्र में नेता आसमान से नहीं उतरता। उसे जनता चुनती है।
इसलिए अगली बार किसी नेता के साथ भीड़ देखकर प्रभावित होने से पहले एक सवाल जरूर पूछिए—भीड़ कितनी है नहीं, काम कितना है?
दबंगई लोकतंत्र की ताकत नहीं, उसकी कमजोरी है
राजनीति में विचारों का संघर्ष होना चाहिए, नीतियों पर बहस होनी चाहिए, विकास के मॉडल पर चर्चा होनी चाहिए और जनता के मुद्दों पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। लेकिन यदि विचारों की जगह बाहुबल, संवाद की जगह धमक और जनसेवा की जगह शक्ति प्रदर्शन ले ले, तो यह लोकतंत्र की मजबूती नहीं बल्कि कमजोरी है।
नेता के साथ दस ईमानदार नागरिक खड़े हों तो वह ताकत है। लेकिन जनता में भय पैदा करने वाली भीड़ खड़ी करके राजनीतिक प्रभाव दिखाना लोकतांत्रिक नेतृत्व की पहचान नहीं हो सकता। लोकतंत्र में सम्मान मांगा नहीं जाता, कमाया जाता है।
जनता को प्रतिनिधि चुनना है, मालिक नहीं
नगर निकाय चुनाव केवल एक पार्षद चुनने का अवसर नहीं है। यह तय करने का अवसर है कि आने वाले वर्षों में आपके मोहल्ले और शहर की आवाज कौन बनेगा। इसलिए उम्मीदवार का चेहरा नहीं, उसका चरित्र देखिए। उसकी गाड़ी नहीं, उसका पिछला काम देखिए। उसके समर्थकों की संख्या नहीं, उसकी जनता के प्रति उपलब्धता देखिए। उसका भाषण नहीं, उसकी जवाबदेही देखिए।
यह भी देखिए कि चुनाव के बाद वह आपके बीच रहता है या अगला चुनाव आने तक दिखाई नहीं देता।
एक दिन पोस्टर उतर जाएंगे
आज जिन नेताओं के बड़े-बड़े पोस्टर लगे हैं, कल वही पोस्टर उतर जाएंगे। आज जिनके स्वागत में ढोल बज रहे हैं, कल वही ढोल किसी और के लिए बजेंगे। आज जिनके काफिले सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं, कल वही गाड़ियां अपने-अपने गैराज में खड़ी होंगी। लेकिन जनता की समस्याएं वहीं रहेंगी।
सड़क वही होगी। नाली वही होगी। पानी की समस्या वही होगी। बेरोजगारी और स्थानीय सुविधाओं के सवाल वही होंगे। और फिर जनता के सामने वही सवाल खड़ा होगा—हमने इन्हें चुना ही क्यों था?
अब फैसला जनता के हाथ में है
राजनीति तब सुधरेगी जब जनता नेता के चेहरे से ज्यादा उसके चरित्र को महत्व देगी। जब वोट जाति, धर्म, पैसा, दबंगई और दिखावे से ऊपर उठकर काम, ईमानदारी और जवाबदेही पर पड़ेगा। जब मतदाता यह कहने का साहस करेगा—हमें भीड़ वाला नेता नहीं, हमारे बीच खड़ा रहने वाला नेता चाहिए।
और जब नेता यह समझ जाएगा कि जनता डरकर नहीं, सोचकर वोट देती है—तभी राजनीति की दिशा बदलेगी।
वरना लोकतंत्र का मंच सजा रहेगा। पोस्टर लगते रहेंगे। काफिले निकलते रहेंगे। नारे लगते रहेंगे। शक्ति प्रदर्शन होते रहेंगे। और जनता पांच साल तक वही पुराना सवाल पूछती रहेगी—
“कब सुधरेगी हमारी राजनीति?”
शायद इसका जवाब नेताओं के पास नहीं है।
इसका जवाब जनता के पास है।
और वह जवाब है—
