आरक्षण, समाज और राजनीति: फैसला वोट करेगा या समाज?

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“समाज सोता रहा तो राजनीति जागकर उसका भविष्य लिख देगी!”

समाज से सवाल—इस बार वोट किसके नाम, समाज के सम्मान के नाम या राजनीतिक प्रभाव के नाम?

अजमेर : अजमेर के सबसे हॉट वार्ड नंबर 4 की OBC आरक्षित सीट को लेकर शुरू हुई राजनीतिक अब सिर्फ चुनावी मुकाबले तक सीमित नहीं रही। सोशल मीडिया पर धर्मेंद्र गहलोत के द्वारा एक पोस्ट साझा की गई । जिससे समाज की प्रतिष्ठा, आरक्षण की भावना और स्थानीय राजनीति के चरित्र पर प्रश्न खड़ा कर दिया है।

पूर्व मेयर धमेंद्र गहलोत की ओर से साझा की गई पोस्ट में वार्ड नंबर 4 से चुनाव लड़ रहीं मोनिका चौधरी (जैन) को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। पोस्ट में कथित वीडियो के आधार पर जैन समाज के लिए अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल और समाज को लेकर की गई कथित टिप्पणी पर सवाल खड़े किए गए हैं। लेकिन सवाल सिर्फ एक उम्मीदवार का नहीं है पूरे समाज और संस्कृति सम्मान का है ।

आरक्षण सामाजिक न्याय है या राजनीतिक गणित?

OBC आरक्षित सीट का मूल उद्देश्य उन वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना है, जिन्हें लंबे समय तक सत्ता और निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त भागीदारी नहीं मिली। ऐसे में चुनावी राजनीति में यह सवाल स्वाभाविक है कि आरक्षण की भावना और उसके वास्तविक प्रतिनिधित्व के बीच कहीं राजनीतिक सुविधा का खेल तो नहीं खेला जा रहा?

यदि कोई व्यक्ति कानूनी रूप से पात्र है और निर्वाचन नियमों के अनुसार चुनाव लड़ सकता है, तो चुनाव लड़ना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन मतदाता के पास यह अधिकार भी है कि वह उम्मीदवार की सामाजिक स्वीकार्यता, राजनीतिक पृष्ठभूमि, विचारधारा, सार्वजनिक व्यवहार और क्षेत्र के प्रति जवाबदेही को परखे।

यहीं से असली परीक्षा शुरू होती है।

समाज के नाम पर राजनीति—और समाज के पदाधिकारी मौन क्यों?

जैन समाज हो या कोई दूसरा समाज—उसके नाम पर राजनीति करने वालों से भी सवाल होना चाहिए। क्या समाज के पदाधिकारी केवल चुनाव के समय सक्रिय होंगे? क्या वे उम्मीदवारों के सामाजिक व्यवहार पर सवाल उठाएंगे या राजनीतिक समीकरण देखकर चुप रहेंगे? क्या समाज के सम्मान का अर्थ सिर्फ मंचों पर भाषण और स्वागत समारोह है, या फिर गलत भाषा और गलत राजनीतिक परंपराओं के खिलाफ लोकतांत्रिक आवाज उठाना भी समाज की जिम्मेदारी है?

समाज किसी नेता की निजी राजनीतिक संपत्ति नहीं

समाज के लोग किसी राजनीतिक दल, नेता या पदाधिकारी के वोट बैंक नहीं हैं।

अजमेर की राजनीति पर भी सवाल

यह विवाद अजमेर की उस पुरानी राजनीतिक संस्कृति पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है, जहां वर्षों से जाति, समाज, गुट और व्यक्तिगत प्रभाव के समीकरणों के सहारे राजनीति को साधने की कोशिशों के आरोप लगते रहे हैं। आज सवाल यह भी है कि क्या स्थानीय राजनीति वास्तव में जनता के मुद्दों पर लड़ेगी?

आनासागर की व्यवस्थाओं से लेकर स्मार्ट सिटी के कामों तक,

जनता लंबे समय से खर्च, गुणवत्ता, जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाती रही है। इन तमाम मुद्दों पर राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

यदि राजनीति का पूरा ध्यान सिर्फ यह तय करने में लग जाए कि किस समाज का वोट किस खेमे में जाएगा, तो फिर शहर के वास्तविक मुद्दे कौन उठाएगा?

सड़क कौन बनाएगा?
नालियां कौन सुधारेगा?
आनासागर की व्यवस्था कौन देखेगा?
स्मार्ट सिटी के कामों का हिसाब कौन देगा?
और जनता के पैसे की जवाबदेही कौन तय करेगा?

जैन समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल

इस पूरे विवाद में जैन समाज के सामने शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है—

क्या समाज अपनी राजनीतिक पसंद किसी व्यक्ति, परिवार या राजनीतिक दबाव के आधार पर तय करेगा या अपने विवेक और सार्वजनिक मुद्दों के आधार पर?

किसी समाज का सम्मान किसी एक उम्मीदवार से बड़ा है और किसी नेता की राजनीति से भी बड़ा। यदि किसी व्यक्ति ने वास्तव में समाज का अपमान किया है, तो उसका जवाब गाली या विवाद से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से दिया जाना चाहिए। और यदि लगाए गए आरोप गलत हैं, तो संबंधित पक्ष को भी सामने आकर तथ्य, संदर्भ और पूरा वीडियो सार्वजनिक करके स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

फैसला समाज नहीं, मतदाता करेगा

लोकतंत्र में आखिरकार फैसला किसी समाज के कुछ पदाधिकारी नहीं करते। फैसला मतदाता करता है। इसलिए इस बार सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन किस समाज से है।

सवाल यह होना चाहिए—

कौन जनता के लिए खड़ा रहेगा?
कौन शहर के मुद्दों पर बोलेगा?
कौन भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर सवाल करेगा?
कौन अपने समाज के साथ-साथ सर्वसमाज की आवाज बनेगा?
और कौन चुनाव जीतने के बाद जनता के बीच उपलब्ध रहेगा?

राजनीति में समाजों का सम्मान होना चाहिए, लेकिन समाजों को राजनीति का मोहरा बनाना लोकतंत्र की कमजोरी है।

आरक्षण अधिकार है, मजाक नहीं।
समाज सम्मान है, वोट बैंक नहीं।
राजनीति सेवा है, कब्जा नहीं।

अब फैसला न किसी नेता के बयान से होगा, न किसी पदाधिकारी की अपील से।

फैसला वार्ड की जनता करेगी—और फैसला उसकी उंगली पर लगी स्याही करेगी

धर्मेंद्र गहलोत द्वारा की गई पोस्ट देखें :

https://www.facebook.com/share/r/1F6ghDHBxL

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