हरिद्वार। देश में जातीय आधार पर बढ़ती दूरियों और उससे जुड़े विवादों के बीच योगगुरु स्वामी रामदेव का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने कहा कि समाज के अलग-अलग जातीय वर्गों के बीच बढ़ती दूरी चिंता का विषय है। यदि यह तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो देश में “गृहयुद्ध जैसी स्थिति” पैदा होने का खतरा हो सकता है। स्वामी रामदेव ने कहा कि संविधान और लोकतंत्र की मूल भावना यही है कि हर नागरिक समान है। उनके मुताबिक किसी भी व्यक्ति या वर्ग के साथ जातीय आधार पर प्रताड़ना नहीं होनी चाहिए—चाहे वह सवर्ण हो, पिछड़ा वर्ग हो, एससी-एसटी या आदिवासी समाज से हो।
जाति के आधार पर पहचान और अवसर पर उठाया सवाल
स्वामी रामदेव ने जातीय विभाजन की चर्चा करते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के समय बच्चों से जाति पूछी जाती है और जाति के आधार पर आरक्षण, प्रवेश, चयन तथा प्रमोशन जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख किया जाता है। उनका कहना था कि बच्चों के बीच जाति और वर्ग के आधार पर घृणा और नफरत पैदा होने से रोकना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि देश में बनने वाला कोई कानून एकतरफा नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार यदि किसी कानून के कारण किसी वर्ग को प्रताड़ित किए जाने की स्थिति बनती है तो उसके सामाजिक प्रभाव को गंभीरता से समझना होगा।
“न सवर्ण की प्रताड़ना हो, न पिछड़े-SC-ST की”
स्वामी रामदेव ने स्पष्ट तौर पर कहा कि जातीय आधार पर किसी की प्रताड़ना नहीं होनी चाहिए। उनका कहना था कि न सवर्ण समाज के साथ अन्याय हो और न पिछड़े, एससी, एसटी अथवा आदिवासी समाज के साथ। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब UGC की 2026 की उच्च शिक्षा समानता संबंधी नियमावली को लेकर विरोध-प्रदर्शन जारी हैं। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक इस मुद्दे पर सामान्य वर्ग से जुड़े संगठनों ने विरोध जताया है, जबकि नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से निपटना बताया गया है। सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद नियमावली फिलहाल लागू स्थिति में नहीं है और केंद्र ने इसे पुनर्विचार के लिए रखा है।
बयान ने फिर गरमाया जातीय बहस का मुद्दा
स्वामी रामदेव के बयान ने एक बार फिर जाति, आरक्षण, समानता और भेदभाव को लेकर चल रही राष्ट्रीय बहस को केंद्र में ला दिया है। हालांकि उनके बयान का मूल संदेश किसी भी वर्ग के साथ प्रताड़ना और भेदभाव से बचने तथा सामाजिक दूरी कम करने पर केंद्रित है।देश में इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग वर्गों और संगठनों की अपनी-अपनी राय है। ऐसे में रामदेव की यह टिप्पणी आने वाले दिनों में जातीय भेदभाव और UGC नियमों को लेकर चल रही बहस में एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक प्रतिक्रिया के तौर पर देखी जा रही है।
