28अक्टूबर2026 रीवा मध्यप्रदेश रीवा। जिले के रोझौही क्षेत्र में प्रस्तावित परमाणु विद्युत परियोजना को लेकर भूमि अधिकार, वन अधिकार पट्टों, ग्रामसभा की भूमिका और सुरक्षा मानकों से जुड़े सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों और आदिवासी समुदाय के लोगों का आरोप है कि वर्ष 2020-21 में वितरित किए गए 300 से अधिक वन अधिकार पट्टों की जमीन के आसपास ही परियोजना प्रस्तावित है। इसको लेकर ग्रामीणों ने प्रशासन से भूमि आवंटन की प्रक्रिया और संबंधित अनापत्ति प्रमाणपत्रों (NOC) की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।यह मामला अब केवल परियोजना के समर्थन और विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि भूमि अधिकारों, स्थानीय आबादी की सुरक्षा और प्रशासनिक प्रक्रिया की पारदर्शिता से भी जुड़ गया है।
300 से अधिक वन अधिकार पट्टों को लेकर सवाल
ग्रामीणों के मुताबिक, वर्ष 2020-21 में संबंधित विभागों की प्रक्रिया के तहत पात्र आदिवासी परिवारों को वन अधिकार पट्टे दिए गए थे। उनका कहना है कि जिस क्षेत्र में अब परमाणु परियोजना प्रस्तावित बताई जा रही है, वहां पट्टाधारकों के अधिकारों और भूमि की स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि यदि संबंधित भूमि पर वन अधिकार मान्य हैं, तो परियोजना के लिए भूमि चयन, अनापत्ति प्रमाणपत्र और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाएं किस आधार पर आगे बढ़ाई गईं। हालांकि, 300 से अधिक पट्टों की वास्तविक स्थिति, प्रस्तावित परियोजना से उनका भौगोलिक संबंध और NOC जारी होने के दावे की स्वतंत्र दस्तावेजी पुष्टि आवश्यक है। इस संबंध में संबंधित विभागों का आधिकारिक पक्ष भी सामने आना महत्वपूर्ण है।
आबादी और सुरक्षा मानकों पर उठे सवाल
प्रस्तावित स्थल के आसपास की आबादी को लेकर भी ग्रामीणों ने चिंता जताई है। उनका दावा है कि परियोजना स्थल के पांच किलोमीटर के दायरे में लगभग 30 हजार लोग रहते हैं। वहीं, दस किलोमीटर के दायरे में लालगांव के कस्बाई क्षेत्र की आबादी लगभग 15 हजार और ग्राम पंचायत सरई कला की आबादी करीब पांच हजार बताई जा रही है।ग्रामीणों का कहना है कि इतनी बड़ी आबादी के निकट परमाणु परियोजना प्रस्तावित होने की स्थिति में स्थल चयन, आपातकालीन प्रबंधन, विकिरण सुरक्षा और आबादी संबंधी मानकों की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए।परमाणु संयंत्रों के लिए लागू सुरक्षा मानकों और आबादी संबंधी निर्धारित सीमाओं के बारे में अंतिम निष्कर्ष संबंधित नियामकीय दिशा-निर्देशों, स्थल की वास्तविक सीमाओं तथा आधिकारिक जनसंख्या आंकड़ों की जांच के बाद ही निकाला जा सकता है। इसलिए ग्रामीणों द्वारा बताए गए आंकड़ों और नियमों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
रोझौही और सरई कला क्षेत्र के ग्रामीणों की ओर से उठाए जा रहे प्रमुख मुद्दे इस प्रकार हैं:वन अधिकार पट्टों और संबंधित भूमि अभिलेखों की स्थिति सार्वजनिक की जाए।प्रस्तावित परियोजना के लिए भूमि चयन तथा NOC से जुड़े दस्तावेज स्पष्ट किए जाएं।ग्रामसभा की सहमति और कानूनी प्रक्रिया की स्थिति बताई जाए।स्थल चयन, जल संसाधन, पर्यावरण और परमाणु सुरक्षा संबंधी आकलन की जानकारी दी जाए।स्थानीय लोगों की आपत्तियों पर सुनवाई कर प्रशासन अपना आधिकारिक पक्ष रखे।ग्रामीणों का कहना है कि जब तक इन सवालों पर स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती, तब तक उनकी आशंकाओं का समाधान संभव नहीं है।
सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने भी उठाए सवाल
भू-अधिकार और वन अधिकार से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने भी प्रस्तावित परियोजना के स्थल चयन और प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, स्थानीय आदिवासियों और ग्रामीणों के अधिकारों तथा परियोजना से जुड़े नियमों की स्पष्ट जांच होनी चाहिए।उनकी आपत्तियों के संदर्भ में वन अधिकार पट्टों, भूमि अभिलेखों, ग्रामसभा के प्रस्तावों और संबंधित विभागों के दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण होगी।
प्रशासन के सामने जवाबदेही की चुनौती
रोझौही परियोजना को लेकर विवाद के बीच अब संबंधित प्रशासनिक विभागों के सामने भूमि की वास्तविक स्थिति, वन अधिकार पट्टों, NOC और सुरक्षा संबंधी सवालों पर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध कराने की जरूरत है।परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं से बिजली उत्पादन और ऊर्जा आवश्यकताओं से जुड़े संभावित लाभों पर चर्चा अपनी जगह है, लेकिन किसी भी परियोजना के मामले में स्थानीय नागरिकों के कानूनी अधिकारों, पर्यावरणीय प्रभावों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का परीक्षण भी आवश्यक है। फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि रोझौही में प्रस्तावित परियोजना की वास्तविक भूमि स्थिति क्या है, वन अधिकार पट्टों का उससे क्या संबंध है और स्थल चयन किन आधिकारिक मानकों के आधार पर किया गया है?इन सवालों के जवाब संबंधित दस्तावेजों और प्रशासन के आधिकारिक पक्ष से ही स्पष्ट हो सकेंगे।
