दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी
नई दिल्ली/जयपुर/चूरू।
देश की सर्वोच्च मानवाधिकार संस्था (एनएचआरसी) ने राजस्थान के चूरू जिले से जुड़े एक सनसनीखेज प्रशासनिक लापरवाही मामले में कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने 18 फरवरी 2026 को पारित आदेश में राजस्थान सरकार के चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रधान सचिव और जिला मजिस्ट्रेट, चूरू को अंतिम अनुस्मारक जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर विस्तृत एवं तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
आयोग ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समयसीमा में जवाब नहीं दिया गया तो मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 13 के तहत दंडात्मक शक्तियों का प्रयोग किया जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
शिकायत के अनुसार बीकानेर के में मृत जन्मे नवजात जुड़वा बच्चों के स्थान पर उनकी जीवित माता के नाम से मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी कर दिया गया। इस चौंकाने वाली प्रशासनिक त्रुटि के कारण महिला को सरकारी अभिलेखों में “मृत” दर्ज कर दिया गया, जिसके चलते उनका नाम राज्य की विभिन्न जनकल्याण योजनाओं से स्वतः हट गया।
परिणामस्वरूप महिला को न केवल सरकारी लाभों से वंचित होना पड़ा, बल्कि मानसिक आघात, सामाजिक अपमान और आर्थिक संकट का सामना भी करना पड़ा। यह मामला डिजिटल रिकॉर्ड प्रबंधन और सरकारी तंत्र की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
पहले भी मांगी गई थी रिपोर्ट
आयोग ने 23 सितंबर 2025 को संबंधित अधिकारियों से जवाब तलब किया था, लेकिन लंबे समय तक कोई संतोषजनक रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई। अब आयोग ने अंतिम अवसर देते हुए 28 मार्च 2026 तक एचआरसीनेट पोर्टल पर विस्तृत रिपोर्ट अपलोड करने का निर्देश दिया है।
साथ ही को भी निर्देशित किया गया है कि यदि इस प्रकरण में कोई कार्रवाई या संज्ञान लिया गया हो तो उसकी जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
सम्पत सिंह राजपुरोहित की निर्णायक पहल
यह कार्रवाई राष्ट्रीय अपराध जाँच ब्यूरो, नई दिल्ली के राज्य जनसंपर्क अधिकारी सम्पत सिंह राजपुरोहित की सक्रिय पहल के बाद संभव हो सकी। उन्होंने इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताते हुए आयोग से हस्तक्षेप की मांग की थी। उनका कहना है कि “किसी जीवित नागरिक को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर देना संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है और प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा है।”
राष्ट्रीय स्तर पर बन सकती है मिसाल
यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह प्रकरण न केवल दोषियों की जवाबदेही तय करेगा, बल्कि देशभर में डिजिटल रिकॉर्ड प्रणाली, मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर सख्त सुधारों की राह भी प्रशस्त कर सकता है।
अब सबकी नजर 28 मार्च 2026 की समयसीमा पर है—क्या प्रशासन जवाब देगा या मानवाधिकार आयोग की दंडात्मक कार्रवाई का सामना करेगा?
