कोटा की त्रासदी: दो मासूम चिराग बुझ गए, क्या सरकार अब भी चुप रहेगी?

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कोटा, राजस्थान:
कोटा शहर के अनंतपुरा थाना क्षेत्र के दीपश्री अपार्टमेंट में अचानक रविवार को लगी आग ने एक परिवार की पूरी दुनिया उजाड़ दी। टीवी बाल कलाकार वीर शर्मा (10) और उनका बड़ा भाई शौर्य शर्मा (16) धुएं में घुटकर इस दुनिया से चले गए। दोनों बच्चे घर में अकेले थे, मां मुंबई में और पिता भजन कार्यक्रम में। कुछ ही मिनटों में सपनों से भरा घर राख और सन्नाटे में बदल गया।

वीर, जिसने रामायण धारावाहिक में पुष्कल का किरदार निभाकर पहचान बनाई थी, और शौर्य, जो आईआईटी की तैयारी कर रहा था, दोनों ही भविष्य की उम्मीद थे। पड़ोसी दरवाजा तोड़कर पहुंचे, बच्चों को बाहर निकाला, लेकिन अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते सब खत्म हो चुका था। माता-पिता की आंखों के सामने उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी — उनके बच्चे — उनसे छिन गए।

इस परिवार ने इतनी बड़ी त्रासदी के बीच भी इंसानियत का सबसे बड़ा उदाहरण पेश किया और दोनों बच्चों की आंखें नेत्रदान कर दीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या समाज और सरकार इस परिवार को आंखें मूंदकर अकेला छोड़ देंगे?

यह कोई अकेली घटना नहीं

7 अक्टूबर 2023 को अजमेर की पुष्कर घाटी में हादसा हुआ था। बजरी से भरे डंपर के नीचे तीन नर्सिंग छात्रों में से दो की मौके पर ही दबकर मौत हो गई थी । चिराग और देवेंद्र — मौके पर ही बजरी से डंपर के नीचे दबे मिले । तीसरा साथी गजेंद्र दो महीने पहले जीवन संघर्ष से हारकर चला गया। जो एक्सीडेंट के बाद से कोमा में ही था , घर पर मां अकेली उसका इलाज करवाती रही ।

देवेंद्र अपने पिता की जगह नौकरी ज्वाइन करने वाला था।

गजेंद्र की मां अकेली रह गई।

चिराग भी अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। अब उनके भी कोई संभालने वाला नहीं ।

दो साल बीतने जा रहे हैं, लेकिन अजमेर के इन परिवारों को न कोई सरकारी सहायता मिली, न कोई सहारा। और दुख की बात यह है कि अजमेर के विधायक, जो आज राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष हैं, उन्होंने इन परिवारों को आज तक सांत्वना देने नहीं पहुंचे। बच्चों के परिवारों के बारे में मृतक के पिता ने लोक सभा अध्यक्ष को पत्र लिख सभी जानकारी दीं लेकिन एक बार उनके ऑफिस से कॉल आने के बाद उनका दूसरा सेशन चल रहा उन्होंने सिर्फ दुख प्रकट कर इति श्री कर दी । ऐसे माता पिता के लिए सरकार को उनके भविष्य को सुरक्षित करने पर ध्यान देना होगा । जिनके बच्चे हादसों में अपनी जान गंवा चुके ।

खबर वन न्यूज का नजरिया

इन दोनों घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि राजस्थान में मासूम बच्चों की मौत पर केवल सहानुभूति और बयान मिलते हैं, ठोस मदद नहीं। सामान्य वर्ग से आने वाले इन परिवारों को कोई सुनने वाला नहीं।

👉 जब कोई जातिगत दबाव बनता है, तब सहायता घोषणाएँ हो जाती हैं।
👉 लेकिन जब किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार के चिराग बुझते हैं, तो सरकार और नेता संवेदना जताकर चुप हो जाते हैं।

क्या यही संवेदनशीलता है? क्या यही शासन है?

सरकार से हमारी मांग

  1. कोटा और अजमेर जैसे हादसों में अपने बच्चों को खो चुके परिवारों के लिए मासिक आर्थिक सहायता शुरू की जाए।
  2. ऐसे परिवारों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार में विशेष सहारा दिया जाए।
  3. पीड़ित माता-पिता को मानसिक और सामाजिक सहयोग देने के लिए विशेष सहायता प्रकोष्ठ बनाया जाए।

विधायक और सरकार से सवाल

क्या इन परिवारों का दर्द सुनने के लिए विधानसभा तक आवाज नहीं पहुंचेगी?

क्या मासूम बच्चों की मौत सिर्फ आंकड़ों में दर्ज होगी?

क्या सरकार केवल राजनीतिक दबाव पर ही जागेगी?


खबर वन न्यूज का संदेश:
यह खबर सिर्फ एक रिपोर्ट नहीं है, यह समाज और सरकार के लिए आईना है। जब परिवारों के चिराग बुझ जाते हैं, तो यह त्रासदी केवल उनका निजी दुख नहीं रहती, बल्कि यह पूरे समाज का घाव बन जाती है।
राजस्थान सरकार और जनप्रतिनिधियों को तुरंत कदम उठाने चाहिए। वरना आने वाली पीढ़ियाँ यही पूछेंगी —
“जब मासूमों की दुनिया बुझ रही थी, तब आप कहाँ थे?”