जयपुर। 16 फरवरी 2026 से शराब की करीब 350 दुकानें अनिश्चितकालीन बंद हो गई हैं। ‘राज लिकर वेलफेयर सोसाइटी’ और ‘लिकर कॉन्ट्रैक्टर्स वेलफेयर एसोसिएशन’ के संयुक्त आह्वान पर ठेकेदारों ने यह कदम उठाया है। राजधानी में अचानक लागू हुई इस बेमियादी ‘शराबबंदी’ से जहां मदिरा उपभोक्ताओं को खाली हाथ लौटना पड़ रहा है, वहीं सरकार के राजस्व पर भी प्रतिदिन करोड़ों रुपये का असर पड़ने की आशंका है।
व्यापारियों का आरोप है कि मौजूदा नियमों के अनुसार दुकानें रात 8 बजे तक खुली रह सकती हैं, लेकिन पुलिसकर्मी शाम 7:30 बजे से ही दुकानों पर पहुंचकर शटर गिराने का दबाव बनाने लगते हैं। उनका कहना है कि शाम का समय बिक्री का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। ऐसे में आधा घंटा पहले बंद कराने से बिक्री प्रभावित होती है और सरकार द्वारा तय ‘गारंटी लक्ष्य’ पूरा करना मुश्किल हो जाता है। इस संबंध में जिला आबकारी अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर पुलिस हस्तक्षेप रोकने की मांग की गई है।
हड़ताल का दूसरा बड़ा कारण नई आबकारी नीति 2026-27 को बताया जा रहा है। सरकार ने ठेकों के नवीनीकरण में 12.5 प्रतिशत गारंटी राशि बढ़ा दी है और बिक्री लक्ष्य भी ऊंचा निर्धारित किया है। लक्ष्य पूरा नहीं होने पर भारी पेनल्टी का प्रावधान है। कारोबारियों का तर्क है कि एक ओर टारगेट बढ़ाया जा रहा है, दूसरी ओर बिक्री के समय पर सख्ती की जा रही है, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।
शराब व्यापारियों ने दुकान बंद करने का समय रात 8 बजे से बढ़ाकर 10 या 11 बजे तक करने की मांग भी रखी है। उनका कहना है कि समय सीमा में लचीलापन दिए बिना बढ़े हुए लक्ष्य को हासिल करना व्यावहारिक नहीं है।
दूसरी ओर पुलिस प्रशासन का कहना है कि रात 8 बजे के बाद दुकानों के बाहर भीड़ और अव्यवस्था से कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है। आबकारी विभाग फिलहाल दोनों पक्षों के बीच समाधान तलाशने की कोशिश में है, ताकि राजस्व और व्यवस्था दोनों संतुलित रह सकें।
अब बड़ा सवाल सरकार की नीतियों को लेकर उठ रहा है। क्या इस बार बनाई गई आबकारी नीति सख्ती से लागू होगी या पूर्व की तरह केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी? अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि विभागीय स्तर पर ही नियमों की स्पष्ट जानकारी और अनुपालन में कमी रहती है।
जनता को उम्मीद है कि सरकार शराब की दुकान, बार और होटलों को दिए जाने वाले लाइसेंस की पूरी जानकारी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक करेगी। यदि लाइसेंस और लोकेशन की पारदर्शी सूची ऑनलाइन उपलब्ध हो, तो आम नागरिक अपने क्षेत्र में अवैध रूप से संचालित दुकानों की सूचना सीधे विभाग को दे सकेंगे। पारदर्शिता और जवाबदेही ही इस विवाद का स्थायी समाधान बन सकती है — अब निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।
