रीवा। देशभर में जब दीपावली पर घर-आंगन दीपों की रोशनी से जगमगा रहे थे, बच्चे आतिशबाजी और मिठाइयों के साथ त्योहार की खुशियां मना रहे थे, उसी वक्त रीवा जिले के रोझौही क्षेत्र में एक अलग ही तस्वीर सामने आई। यहां दीपावली की रात कई घरों में दीये नहीं जले। न घरों में सामान्य सजावट दिखाई दी और न ही त्योहार का उल्लास। वजह थी प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट के विरोध में जारी जनआंदोलन और अपने गांव, जमीन तथा आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को लेकर ग्रामीणों की चिंता।रोझौही के ग्रामीणों ने इस बार दीपावली नहीं मनाने का सामूहिक निर्णय लिया। ग्रामीणों ने त्योहार की खुशियों से दूरी बनाकर शासन-प्रशासन तक अपनी नाराजगी और पीड़ा पहुंचाने का प्रयास किया। उनका कहना है कि जब गांव के अस्तित्व, खेती-किसानी, पानी और पर्यावरण को लेकर सवाल खड़े हों, तब सामान्य तरीके से उत्सव मनाना उनके लिए संभव नहीं है।यह दीपावली केवल दीये न जलाने की कहानी नहीं रही, बल्कि ग्रामीणों के उस संकल्प की तस्वीर बन गई, जिसमें वे अपनी जमीन और भविष्य की सुरक्षा के लिए आंदोलन जारी रखने की बात कह रहे हैं।
दीपावली नहीं मनाने का सामूहिक फैसला, ग्रामीणों ने एकजुट होकर जताया विरोध
रोझौही में दीपावली नहीं मनाने का निर्णय आंदोलन से जुड़े ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से लिया। जमुना आदिवासी, समसेर आदिवासी, संदीप कोल और छोटाले कोल सहित ग्रामीणों ने इस फैसले के माध्यम से अपनी पीड़ा और विरोध जाहिर किया।ग्रामीणों का कहना है कि दीपावली खुशियों और रोशनी का त्योहार है, लेकिन उनके सामने इस समय अपने गांव और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की चिंता सबसे बड़ी है। उनका तर्क है कि जमीन केवल खेती करने का साधन नहीं, बल्कि उनके परिवार की आजीविका, पहचान और आने वाली पीढ़ियों की विरासत है।ग्रामीणों के मुताबिक, जब तक उनकी आशंकाओं का समाधान नहीं होता और प्रस्तावित परियोजना को लेकर उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
440 मेगावाट का प्रस्तावित न्यूक्लियर प्लांट बना विरोध की वजह
परियोजना के शुरुआती तकनीकी अध्ययन के लिए क्षेत्र में दो बोरिंग मशीनें पहुंची थीं। प्रस्तावित योजना के तहत कुल आठ बोरहोल किए जाने थे, जिनमें चार की गहराई लगभग 100 मीटर और चार की लगभग 50 मीटर निर्धारित बताई गई थी।ग्रामीणों ने इस प्रक्रिया का विरोध किया और मौके पर पहुंचकर काम रुकवा दिया। 9 अक्टूबर को कंपनी, प्रशासन और ग्रामीणों के बीच हुई बैठक भी किसी निर्णायक नतीजे तक नहीं पहुंच सकी। ग्राम पंचायत सरई कला की ग्रामसभा में भी परियोजना को लेकर विरोध और आपत्तियां सामने आ चुकी हैं।ग्रामीणों की मुख्य चिंता खेती की जमीन, पेयजल, प्राकृतिक जलस्रोतों और पर्यावरण को लेकर है। टमस और महाना नदी सहित क्षेत्र की प्राकृतिक संपदा पर संभावित प्रभाव को लेकर भी वे सवाल उठा रहे हैं।
ग्रामीणों की चिंता- जमीन और भविष्य की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल
आंदोलन से जुड़े ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास की योजनाओं में स्थानीय लोगों की आजीविका और भविष्य की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।जमुना आदिवासी, समसेर आदिवासी, संदीप कोल और छोटाले कोल सहित ग्रामीणों ने दीपावली नहीं मनाने के फैसले के जरिए यह संदेश देने का प्रयास किया कि उनकी चिंताओं को केवल विरोध प्रदर्शन समझकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।उनका कहना है कि जिस जमीन पर उनका परिवार पीढ़ियों से निर्भर है, उसी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर भविष्य में अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे में त्योहार की खुशियों से ज्यादा जरूरी उन्हें अपने गांव के भविष्य की लड़ाई दिखाई दे रही है।
शिवानंद द्विवेदी बोले- यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं, पूरे क्षेत्र के भविष्य की है
सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता तथा आंदोलनकारी शिवानंद द्विवेदी ने कहा कि रोझौही का संघर्ष केवल जमीन का मुद्दा नहीं है, बल्कि जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़ा व्यापक जनसरोकार है।उनका कहना है कि ग्रामीण विकास के विरोधी नहीं हैं। वे भी चाहते हैं कि क्षेत्र में रोजगार, सुविधाएं और विकास पहुंचे, लेकिन ऐसा विकास नहीं होना चाहिए जिससे स्थानीय लोगों के जीवन, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर संकट खड़ा हो।उन्होंने ग्रामीणों की आशंकाओं को गंभीरता से सुनने और परियोजना से जुड़े सभी पहलुओं पर पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
विमला कोल की याद में परिवार की दीपावली भी रही सूनी
इस आंदोलन के बीच सबसे भावुक तस्वीर विमला कोल के परिवार की रही। आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाली विमला कोल के बिना परिवार की यह दीपावली भी सूनी रही। पति जमुना कोल और परिवार के अन्य सदस्यों के लिए त्योहार के दिन भी उनकी याद और उन्हें खोने का दर्द बना रहा।परिवार के मुताबिक, विमला जल सत्याग्रह में शामिल थीं और करीब चार दिनों तक तालाब में उतरकर विरोध जता रही थीं। तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई।हालांकि, इस घटना को लेकर प्रशासन का पक्ष अलग रहा। कलेक्टर नरेंद्र कुमार सूर्यवंशी ने कहा था कि विमला जल सत्याग्रह में शामिल नहीं थीं और उनकी मौत नित्यक्रिया के दौरान गिरने से हुई थी। इस प्रकार घटना को लेकर परिवार और प्रशासन के दावों में अंतर सामने आया था।विमला के निधन के बाद नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी उनके परिवार से मिलने पहुंचे थे और एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की थी। लेकिन परिवार के लिए अपनों को खोने का दर्द आज भी बरकरार है।
दीपावली पर भी नहीं थमा आंदोलन, प्लांट निरस्त करने की मांग पर अड़े ग्रामीण
त्योहार के दिन भी रोझौही क्षेत्र में आंदोलन का संकल्प कमजोर नहीं पड़ा। ग्रामीणों की मांग है कि प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट की योजना निरस्त की जाए और क्योटी जलप्रपात सहित क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखा जाए।ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें रोजगार और विकास चाहिए, लेकिन अपनी जमीन, पानी और पर्यावरण की कीमत पर नहीं। उनका स्पष्ट कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस सुनवाई नहीं होती, तब तक संघर्ष जारी रहेगा।
रोझौही की सूनी दीपावली ने शासन-प्रशासन के सामने खड़े किए सवाल
इस बार रोझौही की दीपावली ने एक अलग संदेश दिया। एक तरफ देशभर में दीपों की रोशनी और खुशियों का माहौल था, वहीं दूसरी तरफ रोझौही के ग्रामीण अपने गांव के भविष्य को लेकर आंदोलन की राह पर खड़े थे।जमुना आदिवासी, समसेर आदिवासी, संदीप कोल और छोटाले कोल सहित ग्रामीणों का सामूहिक निर्णय बताता है कि यह मुद्दा अब केवल परियोजना के विरोध तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि स्थानीय लोगों की भावनाओं, विश्वास और भविष्य से भी जुड़ गया है।अब निगाहें शासन-प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। सवाल यह है कि ग्रामीणों की आपत्तियों, ग्रामसभा के विरोध और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े सवालों पर कब तक स्पष्ट जवाब सामने आएगा? रोझौही में इस बार दीपावली के दीये भले ही नहीं जले, लेकिन ग्रामीणों ने अपने संघर्ष के जरिए एक सवाल जरूर रोशन कर दिया है—विकास किसके लिए और किसकी कीमत पर?
