न पूजा का आडंबर, न पटाखों का शोर… एक दीपक, दो माता-पिता और उस बेटे की याद, जो शरीर से दूर होकर भी हर पल उनके साथ था !
एक दीया उसके नाम: जो आँखों से ओझल है, पर रूह में बसा है
शहर रोशनी से जगमगा रहा था। घरों के बाहर रंगोली थी, दरवाजों पर दीपों की कतार थी और आसमान आतिशबाजी से चमक रहा था। बाजारों में भीड़ थी, मिठाइयों की खुशबू थी और हर तरफ दीपावली की रौनक दिखाई दे रही थी। लेकिन शहर के एक शांत कोने में एक छोटा-सा घर ऐसा भी था, जिसके आंगन में सिर्फ एक दीपक जल रहा था। उस घर में न पटाखे थे, न बड़ी पूजा की तैयारी और न ही त्योहार के नाम पर कोई दिखावा। वहां एक अधेड़ पति-पत्नी चुपचाप बैठे थे। उनके सामने उनके इकलौते बेटे आदित्य की तस्वीर रखी थी।
राघव और सुधा की जिंदगी तीन वर्ष पहले अचानक बदल गई थी। उनका इकलौता बेटा सड़क दुर्घटना में दुनिया छोड़ गया था। जिस घर में कभी आदित्य की आवाज गूंजती थी, वहां अचानक सन्नाटा उतर आया था। पहले साल दीपावली पर ज्योति ने घर में एक भी दीपक नहीं जलाया। दूसरे साल आतिशबाजी की आवाज सुनकर रामदेव कमरे में जाकर बैठ गया था। उन्हें लगता था कि दीपावली दूसरों के घरों में रोशनी लेकर आती है, लेकिन उनके घर से तो उनका अपना सूरज ही चला गया था।
इस बार कुछ अलग था। राघव ने आंगन में सिर्फ एक दीपक जलाया। ज्योति ने उसे देखा और पूछा, “आज भी सिर्फ एक दीपक?” रामदेव ने धीमे से कहा, “घर में अब तीन नहीं, दो लोग रहते हैं।” ज्योति की आंखें भर आईं। उसने तस्वीर की ओर देखते हुए कहा, “तुम अभी भी उसे गिनना भूल जाते हो।” रामदेव ने पूछा, “वह है कहां?” ज्योति ने जवाब दिया, “शायद ‘होना’ और ‘दिखना’ एक बात नहीं है।”
आदित्य के जाने के बाद दोनों ने बहुत कुछ समझने की कोशिश की थी। उन्होंने मंदिरों के चक्कर नहीं लगाए, किसी चमत्कार की तलाश नहीं की और न ही किसी अंधविश्वास को अपने दुख का सहारा बनाया। धीरे-धीरे उन्होंने यह स्वीकार करना शुरू किया कि मृत्यु शरीर को हमसे दूर कर सकती है, लेकिन प्रेम और स्मृतियों को नहीं। उन्होंने तय किया कि वे अपने बेटे को वापस मांगने के बजाय उसके जीवन से मिले संदेश को अपने जीवन में उतारेंगे।
ज्योति ने उस रात आदित्य की तस्वीर उठाई और मुस्कुराते हुए कहा, “याद है, उसे पटाखे पसंद नहीं थे?” रामदेव की आंखों में भी हल्की मुस्कान आई। उसने कहा, “वह कहता था—पापा, हम आसमान को इतना क्यों डराते हैं?” दोनों कुछ क्षण हंसे और फिर उसी हंसी के बीच उनकी आंखों से आंसू बह निकले। उन्हें याद आया कि आदित्य अक्सर कहता था कि अगर त्योहार मनाना है तो किसी ऐसे व्यक्ति के घर दीपक जलाना चाहिए, जहां अंधेरा हो।
उसी क्षण ज्योति ने कहा, “आज हम वही करेंगे।” रामदेव ने पूछा, “पूजा नहीं करेंगे?” ज्योति ने सामने रखे दीपक को देखते हुए कहा, “जिस घर में कोई भूखा हो, किसी अकेले को बात करने वाला न मिले और किसी दुखी इंसान के पास बैठने वाला कोई न हो, वहां केवल तस्वीर के सामने फूल चढ़ाने से भगवान कैसे प्रसन्न होंगे?”
रामदेव कुछ नहीं बोला। दोनों ने उस रात कोई बड़ी पूजा नहीं की। उन्होंने बस हाथ जोड़कर संसार के लिए प्रार्थना करने का फैसला किया। ज्योति ने आंखें बंद कीं और कहा, “हे ईश्वर, जिस दुख से हम गुजरे हैं, किसी माता-पिता को उससे मत गुजारना। जिस घर में आज दीपावली है, वहां प्रेम बनाए रखना और जिस घर में आज कोई रो रहा है, वहां उम्मीद भेजना।”
रामदेव की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा, “जिसके घर में भोजन नहीं, वहां भोजन पहुंचाना। जिसके मन में अंधेरा है, वहां उम्मीद पहुंचाना। जो माता-पिता अपने बच्चों से दूर हैं, आज उन्हें अपने बच्चों की आवाज सुनवा देना।” यह पूजा किसी धार्मिक विधि से कम नहीं थी। फर्क सिर्फ इतना था कि इसमें किसी कर्मकांड की जरूरत नहीं थी। इसमें मनुष्य की पीड़ा के प्रति संवेदना ही प्रार्थना बन गई थी।
इसी बीच अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। रात काफी हो चुकी थी। रामदेव ने दरवाजा खोला, लेकिन बाहर कोई नहीं था। चौखट के पास मिट्टी का एक छोटा-सा दीपक रखा था। उसके नीचे कागज का एक टुकड़ा था। रामदेव ने उसे उठाकर खोला। उस पर लिखा था—“आज घर में रोशनी कम है… बाहर बहुत अंधेरा है।”
रामदेव कुछ क्षण तक उस कागज को देखता रहा। ज्योति उसके पास आई। दोनों के मन में एक साथ कई सवाल उठे। यह संदेश किसने रखा? कौन उन्हें जानता था? और क्यों? तभी ज्योति की नजर उस मिट्टी के दीपक पर पड़ी। उसने उसे हाथ में लिया तो नीचे लाल रंग से एक छोटा-सा अक्षर बना था—‘अ’। आदित्य के नाम का पहला अक्षर।
दोनों कुछ देर तक बिल्कुल शांत रहे। रामदेव ने खुद को समझाते हुए कहा, “शायद किसी ने मजाक किया है।” लेकिन ज्योति ने कहा, “नहीं … शायद यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि एक संदेश है।” रामदेव ने पूछा, “किस बात का?” ज्योति ने धीमे से कहा, “आदित्य लौटकर नहीं आया है। शायद वह कभी गया ही नहीं था।”
उस रात उन्होंने पहली बार बेटे की मृत्यु को अलग नजर से देखा। उन्हें लगा कि आदित्य शरीर से भले उनके बीच नहीं था, लेकिन उसके विचार, उसकी बातें, उसकी संवेदनाएं और उसका प्रेम अभी भी उनके जीवन में मौजूद है। उन्हें यह समझ आने लगा कि आत्मा का सान्निध्य किसी चमत्कार में दिखाई देना जरूरी नहीं। कभी वह किसी स्मृति में मिलता है, कभी किसी बच्चे की हंसी में, कभी किसी जरूरतमंद की आंखों में और कभी अपने भीतर उठती करुणा में।
कुछ देर बाद गली के कुछ बच्चे उनके दरवाजे पर आए। उनके हाथों में छोटे-छोटे मिट्टी के दीपक थे। एक बच्चे ने कहा, “अंकल, ये आपके लिए।” रामदेव ने पूछा, “क्यों?” बच्चे ने मासूमियत से कहा, “हमारे घर में आज ज्यादा दीपक हैं। मम्मी कहती हैं, दीपक बांटने से रोशनी कम नहीं होती।”
यह सुनकर रामदेव की आंखें भर आईं। ज्योति रसोई में गई और बच्चों के लिए मिठाई ले आई। बच्चों ने मिठाई खाई, दीपक जलाए और हंसते हुए वापस चले गए। रामदेव देर तक उन्हें जाता हुआ देखता रहा। फिर उसने ज्योति से कहा, “आज आदित्य आया था।”
ज्योति ने मुस्कुराकर कहा, “मैंने कहा था न… वह गया ही नहीं।”
रामदेव ने पूछा, “लेकिन वह आया कहां?” ज्योति ने उसके सीने पर हाथ रखा और कहा, “यहां… और उन बच्चों की हंसी में भी। उस मां की प्रार्थना में भी, जो आज अपने बेटे को याद कर रही होगी। उस पिता की आंखों में भी, जो अपने बच्चे को खो चुका है।”
उस रात रामदेव और ज्योति ने आदित्य की तस्वीर के सामने दीपक रखा। लेकिन इस बार उन्होंने उससे अपने बेटे को वापस नहीं मांगा। उन्होंने सिर्फ इतना कहा—“जहां भी हो, सुखी रहना। और हमें इतना मजबूत बनाना कि हम किसी दूसरे के जीवन का अंधेरा थोड़ा कम कर सकें।”
बाहर आतिशबाजी का शोर था। आकाश रंगों से भर रहा था। लेकिन उस छोटे-से घर में सिर्फ एक दीपक जल रहा था। उस दीपक की लौ में उन्हें बेटे का चेहरा नहीं, बल्कि उसके विचारों का उजाला दिखाई दे रहा था।
शायद यही दीपावली का असली अर्थ है। अंधेरे से लड़ने के लिए हजारों दीपक जलाना जरूरी नहीं। कभी-कभी एक दीपक(चिराग़) भी पर्याप्त होता है, यदि वह किसी टूटे हुए मन में उम्मीद जगा दे। त्योहार की सुंदरता महंगे कपड़ों, मिठाइयों, पटाखों या दिखावे में नहीं, बल्कि उस संवेदना में है जो हमें अपने अलावा किसी दूसरे के दुख को महसूस करना सिखाती है।
रामदेव और ज्योति ने उस रात कोई नई परंपरा नहीं बनाई। उन्होंने बस अपने जीवन का अर्थ बदल दिया। उनके लिए अब दीपावली किसी एक दिन का त्योहार नहीं थी। वह हर वह क्षण थी जब वे किसी दुखी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला सकें, किसी भूखे को भोजन दे सकें, किसी अकेले व्यक्ति के पास बैठ सकें और किसी निराश इंसान को यह विश्वास दिला सकें कि अंधेरा हमेशा नहीं रहता। और शायद आदित्य की आत्मा का सच्चा सान्निध्य भी यही था।
क्योंकि कुछ लोग मृत्यु के बाद हमारे घर से चले जाते हैं, लेकिन यदि उनका प्रेम हमारे व्यवहार में जीवित रह जाए, तो वे कभी हमसे दूर नहीं होते।
उस रात उस छोटे-से घर में दीपावली थी।
न कोई आडंबर था। न कोई अंधविश्वास।
न प्रदर्शन।
बस एक दीपक था, दो आंखों में आंसू थे और पूरी दुनिया के लिए एक प्रार्थना—
“हे ईश्वर, हमारे घर का दीपक चाहे छोटा हो जाए, लेकिन किसी के जीवन की उम्मीद कभी मत बुझाना।”
देवेन्द्र सक्सैना,अजमेर।
