अजमेर नगर निगम की कार्यप्रणाली भी बड़ी करामाती है। यहाँ कैलेंडर बदलते हैं, तारीखें बदलती हैं, चुनाव होते हैं, जनप्रतिनिधि बदल जाते हैं—मगर नगर निगम के दिलो-दिमाग पर छपा ‘रसूख’ कभी एक्सपायर नहीं होता। आनासागर चौपाटी के मुहाने पर सीना ताने खड़ा यह हरा बोर्ड नगर निगम की प्रशासनिक मुस्तैदी का नहीं, बल्कि सत्ता के सामने रीढ़विहीन लाचारी का एक जीता-जागता स्मारक बना हुआ है।
आचार संहिता में ‘अंधा’ हुआ प्रशासन या सत्ता की भक्ति? सबसे चुभने वाला सवाल तो जिला प्रशासन और नगर निगम के उन उड़नदस्तों से है, जो आचार संहिता लगते ही आम नागरिक की दुकान के बाहर लगे 6 इंच के बोर्ड को नोंचने पहुँच जाते हैं। क्या आचार संहिता के उस कड़े दौर में निगम के जिम्मेदारों को चौपाटी पर लगा यह बोर्ड नहीं दिखा? या फिर उस पर लिखा नाम देखकर अफसरों की आँखें स्वतः ‘गांधारी’ मोड में चली गईं? चुनाव बीत गए, नई सरकारें और जनप्रतिनिधि आ गए, पर निगम की मेहरबानी देखिए कि पूर्व पार्षद और वर्तमान शहर जिलाध्यक्ष रमेश सोनी के नाम का यह बोर्ड आज भी अपनी पूरी धमक के साथ झंडा गाड़े खड़ा है।

चाइनीज चकाचौंध के पीछे ‘स्मार्ट सिटी’ का स्याह सच दीपावली के पर्व पर शहर में दिखावटी चाइनीज झालरों की सस्ती चकाचौंध तो खूब बिखेरी गई, लेकिन अजमेर प्रशासन और स्मार्ट सिटी के सफेद हाथियों की हकीकत देखनी हो तो सागर विहार पाथ-वे से लेकर वैशाली नगर पेट्रोल पंप के सामने तक बने पाथ-वे पर चलिए। इस पाथ-वे पर दीपावली जैसे महापर्व पर भी निगम प्रशासन रोशनी तक नहीं कर पाया। महीनों से बंद पड़ी स्ट्रीट लाइटें और जगह-जगह लटके टूटे-फूटे सीसीटीवी कैमरे प्रशासन की निकम्मी कार्यशैली का मुंह चिढ़ा रहे हैं। करोड़ों रुपये बहाकर खुद को ‘स्मार्ट सिटी’ घोषित करने वाले अफ़सरों को शायद यह नहीं दिखता कि अंधेरे में डूबे पाथ-वे और बंद पड़े सुरक्षा कैमरे जनता की सुरक्षा के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ हैं।


जो तंत्र एक पाथ-वे पर लाइट और कैमरे चालू नहीं रख सकता, वह सत्ता के रसूख वाले बोर्डों को चमकाने में दिन-रात एक किए बैठा है।
बड़प्पन दिखाएं जिलाध्यक्ष, नींद से जागे निगम यह किसी व्यक्ति विशेष का विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा और निगम की कार्यशैली का सवाल है। बेहतर होता कि खुद जिलाध्यक्ष आगे आकर इस बोर्ड को उतरवाते और अपनी ही पार्टी की नवनिर्वाचित पार्षद का नाम लिखवाकर संगठन के उच्च संस्कारों का उदाहरण पेश करते।
बहरहाल, अजमेर नगर निगम को अब अपनी ‘दरबारी’ संस्कृति और कागजी स्मार्टनेस से बाहर आना चाहिए। सवाल साफ़ है—क्या निगम तुरंत इस बोर्ड पर वर्तमान निर्वाचित पार्षद का नाम लिखकर और बंद पड़े पाथ-वे की बत्तियां-कैमरे दुरुस्त कर अपनी साख बचाएगा, या फिर सत्ता के रसूख और लापरवाही के अंधेरे में ऐसे ही नतमस्तक रहेगा?
