“संतान से नहीं, संवेदनाओं से बड़ा होता है मातृत्व”
— गोमा देवी
यह हमारे जीवन का अटल सत्य है कि ईश्वर ने हमें संतान का सुख नहीं दिया। जैसा कि रामायण में कहा गया है—
“हानि-लाभ, जीवन-मरण, जस-अपजस विधि हाथ।”
ईश्वर की इच्छा के आगे मनुष्य का कोई वश नहीं चलता। यदि प्रभु ने हमारे जीवन की राह ऐसी लिखी कि हम संतान के सुख से वंचित रहें, तो हमने उसे पूरे मन से स्वीकार किया। यह स्वीकार मजबूरी नहीं, आस्था है। यह कमी नहीं, बल्कि एक व्यापक अपनत्व का विस्तार है।
हमें तनिक भी दुःख नहीं, क्योंकि हमने राजस्थान की हर संतान को अपना ही माना है। इस धरती के बेटे-बेटियाँ ही हमारी असली पूंजी हैं। जब कोई स्नेह से “मां” कहकर पुकारता है, जब किसी की सफलता में हमारा आशीर्वाद जुड़ता है, तब लगता है कि ईश्वर ने हमारी झोली खाली नहीं रखी—बल्कि उसे पूरे प्रदेश के प्यार से भर दिया है। राजस्थान के बेटों-बेटियों के प्रेम ने कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि हम निसंतान हैं।
किन्तु समाज की एक पीड़ादायक सच्चाई भी है। आज भी निसंतान महिला को तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता है। उसे अपमानित किया जाता है, उस पर व्यंग्य किए जाते हैं, जैसे उसका अस्तित्व अधूरा हो। हाल ही में एक मेले में लोकगायक द्वारा हमारे निसंतान होने पर कटाक्ष करते हुए गीत प्रस्तुत किया गया। यह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि हृदय को आहत करने वाले तीर थे। इससे पूर्व भी, जिन्हें हमने स्नेहपूर्वक अपने पुत्र समान माना, उनके द्वारा भी इसी विषय पर व्यंग्य किया गया।
दुख इस बात का नहीं कि हमारे पास संतान नहीं है, बल्कि इस बात का है कि आज भी समाज स्त्री की पूर्णता को केवल मातृत्व से जोड़कर देखता है। क्या एक महिला का मूल्य केवल उसकी कोख से तय होगा? क्या उसका त्याग, सेवा, संघर्ष और समाज के प्रति समर्पण कुछ मायने नहीं रखता?
हमने अपने जीवन को जनता के लिए समर्पित किया है। यदि हमारी गोद सूनी है, तो हमारा हृदय सूना नहीं है। उसमें राजस्थान के हर बच्चे के लिए स्नेह, आशीर्वाद और अपनापन भरा है।
— गोमा देवी

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