अजमेर। (विशेष लेख)
सरकारें जब भी प्रदूषण की बात करती हैं, सबसे पहले निशाने पर आम आदमी का वाहन आ जाता है। राजस्थान की वाहन स्क्रैप नीति-2025 भी इसी परंपरा का हिस्सा बनती दिख रही है। सवाल यह नहीं है कि प्रदूषण कम होना चाहिए या नहीं—सवाल यह है कि क्या सरकार असली कारणों से मुंह मोड़कर आसान रास्ता अपना रही है?

आज शहरों की हवा जहरीली इसलिए नहीं है कि सड़क पर 15 साल पुराना वाहन चल रहा है, बल्कि इसलिए है कि शहरों को चारों ओर से बहुमंजिला इमारतों, फ्लाईओवर और एलिवेटेड रोड्स ने घेर लिया है। ऊपर से आने वाली प्राकृतिक हवा के रास्ते बंद कर दिए गए हैं। नतीजा यह है कि नीचे फैला प्रदूषण बाहर निकल ही नहीं निकल पाता और उसी क्षेत्र में घूमता रहता है। इस सच्चाई पर सरकार की कोई नीति क्यों नहीं बनती?
बाजारों में दम घुटने की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। पहले मकानों के बीच दूरी होती थी, अधिकतम दो मंजिल का निर्माण होता था, जिससे हवा का प्रवाह बना रहता था। आज हर गली में ऊंचे ऊंचे कॉन्क्रीट के महल,होटल, मॉल बनते जा रहे हैं । क्या सरकार बताएगी कि उसने किस नीति के तहत शहरों को सांस लेने के लायक नहीं छोड़ा है?
अब बात आम नागरिक की। वह बुजुर्ग, जिसने 15 साल पहले सीमित संसाधनों में वाहन खरीदा, जिसे शायद सालों में 10–15 हजार किलोमीटर ही चलाया—क्या उसे बुढ़ापे में दोबारा लाखों रुपये खर्च करने के लिए मजबूर करना न्याय है? क्या प्रदूषण केवल उसकी गाड़ी से फैल रहा है या शहर की नाकाम प्लानिंग और सिस्टम के नकारा संरक्षण से?
ग्रामीण-शहरी विभाजन इस नीति का सबसे अनदेखा पहलू शहरों के आसपास बसे गांवों में आज भी हवा शुद्ध है। लेकिन रोज़गार, इलाज और पढ़ाई के लिए लाखों ग्रामीण प्रतिदिन शहरों में आते-जाते हैं। क्या अब उन्हें भी सज़ा भुगतनी होगी? क्या गांवों से शहरों तक जीवन चलाने वाले साधनों पर भी यही एकतरफा नियम लागू होंगे?
सरकार यह भी स्पष्ट करे कि 15 साल से अधिक पुराने सरकारी वाहनों का क्या होगा, जो आज भी बड़ी संख्या में सड़कों पर दौड़ रहे हैं। क्या नियम पहले उन पर लागू होंगे या हमेशा की तरह आम जनता ही सबसे पहले निशाने पर होगी? रोडवेज और निजी बसें आज भी गांवों में परिवहन की रीढ़ हैं, स्कूल बसें बच्चों की जरूरत हैं, छोटे वाहन लाखों परिवारों की रोज़ी-रोटी हैं। क्या सरकार इनके लिए कोई व्यवहारिक समाधान लेकर आई है?
सच्चाई यह है कि यह नीति फिर साबित करती है कि नीतियां फाइलों और कमरों में बैठे सिस्टम के सामने बनती हैं, वास्तविकता यह है कि सरकार हर समस्या अवसर मान व्यापारिक गठबंधन कर आम जनता को थोप देती है लेकिन समस्या जस की तस बनी रहती है ।अप्रत्यक्ष लाभ वाहन उद्योग और बड़े व्यापारिक समूहों को मिलेगा, जबकि बोझ आम आदमी उठाएगा।
अगर सरकार वास्तव में शुद्ध हवा और बेहतर पर्यावरण चाहती है, तो उसे सिर्फ वाहनों को नहीं, बल्कि अनियंत्रित निर्माण, ऊंची इमारतों की होड़ और शहरों की अव्यवस्थित योजना को नियंत्रित करना होगा। वरना वाहन बदल देने से शहर सांस नहीं लेने लगेंगे। सवाल सरकार से है—
क्या वह प्रदूषण से लड़ना चाहती है या सिर्फ आंकड़ों से?
सवाल जनता से-
कब तक नीतियां हमारी जेब और हमारे जीवन पर बिना संवाद के थोपी जाती रहेंगी?
देश और प्रदेश को ऐसी नीतियों की जरूरत है जो कमरों में नहीं, सड़कों पर उतरकर बनाई जाएं ।
