रीवा भोपाल/अजमेर: 289वीं आरटीआई मीट में न्यायिक पारदर्शिता, सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) और सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों पर चर्चा की गई, जिनसे आम नागरिक प्रभावित हुए । बैठक में वक्ताओं ने कहा कि हाल के वर्षों में आरटीआई अधिनियम की मूल भावना कमजोर हुई है और न्यायपालिका से जुड़ी सूचनाओं को गोपनीयता के नाम पर सीमित किया जा रहा है।
बैठक की शुरुआत करते हुए शिवानंद द्विवेदी ने गुजरात हाईकोर्ट और भारत के मुख्य न्यायाधीश से जुड़े अहम फैसलों का उल्लेख किया, जिनका सीधा असर न्यायिक पारदर्शिता पर पड़ा है। वीरेंद्र कुमार ने न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि नियुक्तियों, कॉलेजियम प्रणाली और अदालती रिकॉर्ड से जुड़ी सूचनाओं में पारदर्शिता होनी चाहिए ।
चर्चा में आरटीआई मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने, सूचना देने में देरी, व्यक्तिगत सूचना की छूट के दुरुपयोग और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निजता की विस्तृत व्याख्या पर भी सवाल उठाए गए। वक्ताओं ने माना कि इससे सूचना का अधिकार एक मौलिक अधिकार होते हुए भी व्यवहार में कमजोर होता जा रहा है।
बैठक में न्यायिक प्रणाली की दक्षता, समयबद्ध न्याय, लंबित मामलों के बढ़ते बोझ और राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति को प्रभावी बनाने पर भी चर्चा हुई । शैलेश गांधी ने कहा कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को पारदर्शिता बढ़ाने के साथ-साथ मामलों के त्वरित निपटारे को प्राथमिकता देनी चाहिए।
भ्रष्टाचार, लोक अदालतों और ग्राम न्यायालयों की प्रभावशीलता, न्यायपालिका में जवाबदेही, तथा सार्वजनिक धन के पारदर्शी उपयोग जैसे मुद्दों पर भी खुलकर चर्चा हुई। प्रवीण पटेल ने राजनीति और न्यायिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को लोकतंत्र की आत्मा बताते हुए कॉलेजियम प्रणाली में नागरिक समाज की भागीदारी का सुझाव दिया।
बैठक में यह भी तय हुआ कि न्यायिक पारदर्शिता और राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति से जुड़े मुद्दों को लेकर विभिन्न उच्च न्यायालयों में जनहित याचिकाएं दायर की जाएंगी। मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों में लंबित मामलों के आंकड़ों को आधार बनाकर कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाने की रणनीति बनाई गई।
अंत में सभी वक्ताओं ने कहा कि यदि न्यायपालिका पर जनता का विश्वास बनाए रखना है, तो सूचना के अधिकार को कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत करना होगा। पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध न्याय ही लोकतंत्र की असली कसौटी है।
