ट्रंप का टैक्स बम, भारत-अमेरिका दोनों पर असर-

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ट्रंप सरकार ने H-1B वीज़ा पर लगाया 1 लाख डॉलर का शुल्क, भारत-अमेरिका दोनों पर पड़ेगा असर – पूरा पढ़ें :-

नई दिल्ली/वॉशिंगटन (प्र. स.)अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीयों के लिए सबसे लोकप्रिय वीज़ा H-1B पर बड़ा कदम उठाते हुए नया शुल्क (फी) लगा दिया है। अब नए H-1B वीज़ा आवेदन पर 1 लाख डॉलर (लगभग 83 लाख रुपये) का भुगतान करना होगा। यह नियम 21 सितंबर 2025 से लागू होगा। हालांकि पुराने वीज़ा धारकों और उनके नवीनीकरण (renewals) पर यह शुल्क लागू नहीं होगा।

भारत पर असर

इस फैसले का सबसे बड़ा असर भारत पर पड़ेगा। अमेरिकी कंपनियों में काम करने वाले H-1B धारकों में करीब 70 से 75 प्रतिशत भारतीय होते हैं। अब भारतीय IT कंपनियों और प्रोफेशनल्स पर भारी वित्तीय बोझ बढ़ जाएगा। बड़ी कंपनियाँ तो शायद यह शुल्क चुका दें, लेकिन छोटे-मंझोले उद्यम और स्टार्टअप्स के लिए अमेरिकी बाजार तक पहुँचना मुश्किल हो जाएगा।
भारत सरकार ने भी इस कदम पर चिंता जताई है और कहा है कि इससे भारतीय पेशेवरों के अवसर सीमित होंगे।

अमेरिका पर असर

यह फैसला अमेरिकी कंपनियों पर भी असर डालेगा। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न जैसी दिग्गज कंपनियाँ हर साल हजारों H-1B वीज़ा धारकों को नियुक्त करती हैं। नए शुल्क से उनकी लागत में भारी बढ़ोतरी होगी। जानकारों का कहना है कि इससे भर्ती कम हो सकती है और अमेरिका में पहले से मौजूद टैलेंट गैप और बढ़ जाएगा।
टेक इंडस्ट्री का मानना है कि लंबे समय में इसका नुकसान अमेरिकी रिसर्च, नवाचार और स्टार्टअप्स को होगा।

युवाओं पर असर

इस नीति का सबसे गहरा प्रभाव भारतीय युवाओं पर पड़ेगा। अमेरिका जाकर करियर बनाने का सपना देखने वाले छात्रों और टेक प्रोफेशनल्स के लिए अब यह रास्ता और कठिन हो जाएगा। बड़ी रकम के कारण कई युवा अब कनाडा, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे विकल्पों की ओर रुख करेंगे।
दूसरी ओर, अमेरिकी युवाओं को कुछ हद तक फायदा मिल सकता है, क्योंकि कंपनियाँ अब स्थानीय भर्ती पर जोर देंगी। लेकिन उच्च गुणवत्ता और वैश्विक स्तर के टैलेंट की कमी अमेरिका के तकनीकी विकास को प्रभावित कर सकती है।

ट्रंप सरकार का यह फैसला दोनों देशों के लिए दोहरी धार वाली तलवार साबित हो सकता है। भारत अपने टैलेंट के अवसर सीमित देखेगा, वहीं अमेरिका को उच्च कौशल वाले प्रोफेशनल्स की कमी झेलनी पड़ सकती है। इसका असर आने वाले वर्षों में वैश्विक तकनीकी और आर्थिक संतुलन पर भी दिखाई दे सकता है।

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