अमृतसर/दिल्ली। सिख पंथ के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी की जयंती पर आज पूरे देश में श्रद्धा और भावनाओं का माहौल रहा। मानवाधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता और साहस के प्रतीक माने जाने वाले गुरु तेग बहादुर जी का जीवन त्याग, करुणा और निडरता का असाधारण उदाहरण है। उनका जन्म 1 अप्रैल 1621 को गुरु हरगोबिंद साहिब और माता नानकी के घर अमृतसर में हुआ। जन्म नाम ‘त्यागमल’ था, लेकिन असाधारण शौर्य के कारण उन्हें बाद में ‘तेग बहादुर’ नाम मिला।
गुरु जी बचपन से ही शांत, चिंतनशील और संयमी स्वभाव के थे। युद्ध-कौशल में दक्ष होने के बावजूद उनका झुकाव ध्यान, भक्ति और मानव सेवा की ओर था। विवाह के बाद वे लंबे समय तक बखाला (वर्तमान श्री गुरु तेग बहादुर नगर) में तप, सेवा और अध्ययन में लगे रहे। पिता और गुरुओं से मिली शिक्षा ने उनके भीतर निर्भयता और सहिष्णुता के गुण गहराए।
1664 में, गुरु हरकृष्ण साहिब जी की इच्छा अनुसार उन्हें सिख पंथ का नौवां गुरु बनाया गया। गुरु पद ग्रहण करने के बाद उन्होंने पंजाब से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक लंबी यात्राएँ कीं, जहाँ गुरमत विचार, समानता, भाईचारा और न्याय का संदेश दिया। उनकी वाणी में “मन तूं जोति सरूप है” जैसे संदेश आज भी आत्मिक जागृति का आधार बने हुए हैं। पटना, बनारस, हरिद्वार, असम, आनंदपुर जैसे स्थानों की यात्राओं के दौरान उन्होंने पीड़ितों की रक्षा और सेवा को सर्वोच्च धर्म बताया।
गुरु तेग बहादुर जी का सबसे बड़ा योगदान धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा है। 1675 में कश्मीरी पंडित अत्याचार और जबरन धर्म परिवर्तन से बचने के लिए उनकी शरण में आए। गुरु जी ने अपने प्राणों की आहुति देकर मानवाधिकारों की रक्षा की अभूतपूर्व मिसाल रखी। औरंगज़ेब के आदेश पर उन्हें दिल्ली में गिरफ्तार किया गया, प्रताड़ित किया गया, और अंततः 1675 को चांदनी चौक में शहीद कर दिया गया। इतिहास ने उन्हें इस अद्वितीय बलिदान के लिए “हिंद की चादर” की उपाधि दी।
गुरु तेग बहादुर जी की वाणी आज भी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में मानवता का प्रकाश बनकर मौजूद है। उनकी जयंती पर आज देशभर के गुरुद्वारों में कीर्तन, लंगर और सेवा कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों ने त्याग, सत्य, निर्भयता और स्वतंत्रता के उनके संदेश को याद किया। शहादत और सत्य के मार्ग पर अडिग रहने की उनकी
