रोझौही में 24–25 अक्टूबर को कांग्रेस का शक्ति प्रदर्शन, ‘डेरा डालो–घेरा डालो’ आंदोलन से गरमाएगा परमाणु परियोजना का मुद्दा

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प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट के विरोध में कांग्रेस का दो दिवसीय धरना; ग्रामीणों की सहमति, जमीन, जनस्वास्थ्य और पर्यावरण के सवालों पर सरकार को घेरने की तैयारी

रीवा। विंध्य की धरती पर प्रस्तावित रोझौही न्यूक्लियर पावर प्लांट का मुद्दा अब एक नए राजनीतिक मोड़ पर पहुँचता दिखाई दे रहा है। मनगवां विधानसभा क्षेत्र के ग्राम रोझौही में प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा परियोजना के विरोध को लेकर कांग्रेस पार्टी ने आंदोलन का ऐलान किया है। आगामी 24 और 25 अक्टूबर 2026 को रोझौही में ‘रोझौही चलो, डेरा डालो–घेरा डालो’ के आह्वान के साथ दो दिवसीय धरना-प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा। इस घोषणा के बाद परियोजना को लेकर जारी बहस के बीच राजनीतिक सक्रियता बढ़ने के संकेत हैं। कांग्रेस ने इस आंदोलन के माध्यम से प्रस्तावित परियोजना से जुड़े उन सवालों को प्रमुखता देने की बात कही है, जिनमें ग्रामीणों की सहमति, जमीन का भविष्य, पर्यावरणीय सुरक्षा, जनस्वास्थ्य और किसानों की आजीविका शामिल हैं। पार्टी का आरोप है कि स्थानीय लोगों की स्पष्ट सहमति के बिना परियोजना को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस ने सरकार से इन सवालों पर जवाब देने और ग्रामीणों की चिंताओं को गंभीरता से सुनने की मांग उठाई है।

रोझौही से उठी आवाज, आसपास के गांवों तक आंदोलन पहुँचाने की तैयारी

कांग्रेस ने लालगांव, गढ़, गंगेव और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों से धरना-प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की है। पार्टी का प्रयास है कि प्रस्तावित परियोजना को लेकर ग्रामीणों के बीच मौजूद आशंकाओं और आपत्तियों को एक साझा मंच दिया जाए।इस आंदोलन का संदेश केवल एक गांव तक सीमित नहीं है। परियोजना को लेकर उठ रहे सवालों के केंद्र में यह चिंता है कि विकास संबंधी किसी भी बड़े निर्णय में स्थानीय आबादी की बात कितनी गंभीरता से सुनी जाएगी। ग्रामीणों की जमीन, उनके संसाधनों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर स्पष्टता की मांग अब राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन रही है।

जनस्वास्थ्य और पर्यावरण के सवालों पर सरकार से जवाब की मांग

प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर विरोध करने वाले पक्ष की प्रमुख चिंता जनस्वास्थ्य, पर्यावरणीय प्रभाव और स्थानीय जीवन पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर है। कांग्रेस ने भी इन्हीं मुद्दों को अपने आंदोलन का आधार बनाया है।परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के संबंध में सुरक्षा मानकों, पर्यावरणीय आकलन, जल संसाधनों, भूमि उपयोग और आपातकालीन तैयारियों से जुड़े प्रश्न महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में स्थानीय लोगों की आशंकाओं का समाधान तथ्यात्मक जानकारी, पारदर्शी प्रक्रिया और संबंधित विशेषज्ञों के आकलन के माध्यम से किया जाना जरूरी है।कांग्रेस का कहना है कि इन सवालों को नजरअंदाज करके परियोजना को आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। पार्टी ने ग्रामीणों की चिंताओं को सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाने और सरकार पर जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से आंदोलन का आह्वान किया है।

24 और 25 अक्टूबर पर टिकी नजरें

रोझौही में प्रस्तावित दो दिवसीय धरना-प्रदर्शन अब इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। ‘रोझौही चलो, डेरा डालो–घेरा डालो’ के नारे के साथ कांग्रेस कितनी व्यापक भागीदारी जुटा पाती है और आंदोलन के दौरान कौन-से सवाल प्रमुखता से उठते हैं, इस पर क्षेत्र की नजर रहेगी।इस बीच परियोजना को लेकर विरोध, ग्रामीणों की आपत्तियों और प्रशासनिक पक्ष के बीच संवाद की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। किसी भी बड़े औद्योगिक अथवा ऊर्जा संबंधी प्रस्ताव पर निर्णय लेते समय स्थानीय नागरिकों के सवालों का स्पष्ट उत्तर, संबंधित दस्तावेजों की उपलब्धता और नियमानुसार प्रक्रियाओं का पालन विश्वास कायम करने में अहम भूमिका निभाते हैं। रोझौही में होने वाला यह आंदोलन अब केवल एक धरना नहीं, बल्कि स्थानीय सहमति, विकास की दिशा और जनहित से जुड़े सवालों पर राजनीतिक जवाबदेही की मांग के रूप में सामने आ रहा है। 24 और 25 अक्टूबर को होने वाले प्रदर्शन से यह स्पष्ट होगा कि यह मुद्दा क्षेत्रीय राजनीति में आगे किस रूप में आकार लेता है।

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