गांव की चौपाल से उठी भविष्य की चिंता, महिलाओं सहित ग्रामीणों ने रखी अपनी बात; जमीन, जल, पर्यावरण और जनसुरक्षा के सवालों पर कांग्रेस ने तेज की जनजागरण की मुहिम
रीवा। रोझौही में प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर क्षेत्र में जारी विरोध अब एक व्यापक जनचर्चा का रूप लेता दिखाई दे रहा है। परियोजना के विरोध में कांग्रेस द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन के सातवें दिन आंदोलन ने जनसंवाद का रास्ता अपनाया। ग्राम रोझौही में आयोजित जनचौपाल में जिला कांग्रेस कमेटी के पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता गिरीस सिंह ने ग्रामीणों के बीच बैठकर प्रस्तावित परमाणु परियोजना के संभावित दुष्परिणामों पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान आसपास के गांवों से पहुंचे कांग्रेसजनों के साथ स्थानीय महिला-पुरुषों ने भी अपनी चिंताएं और सवाल सामने रखे।जनचौपाल का संदेश साफ था—रोझौही की जमीन पर प्रस्तावित परियोजना को लेकर चर्चा केवल कागजों, दफ्तरों और राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उन लोगों की आवाज भी सुनी जानी चाहिए जिनका जीवन, आजीविका और भविष्य इस क्षेत्र की मिट्टी, पानी और पर्यावरण से जुड़ा हुआ है।वरिष्ठ कांग्रेस नेता गिरीस सिंह ने ग्रामीणों के बीच पहुंचकर उनकी बातें सुनीं और परियोजना से जुड़े संभावित प्रभावों पर विमर्श किया। उन्होंने ग्रामीणों और महिलाओं से सीधे संवाद करते हुए यह जानने का प्रयास किया कि प्रस्तावित परमाणु संयंत्र को लेकर उनके मन में किस तरह की आशंकाएं हैं। चर्चा के केंद्र में जमीन, जलस्रोत, पर्यावरणीय संतुलन, स्वास्थ्य सुरक्षा, कृषि और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य जैसे महत्वपूर्ण विषय रहे।
विकास की बहस में ग्रामीणों के भविष्य का सवाल सबसे अहम
रोझौही में प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर क्षेत्र में सबसे बड़ा सवाल यही है कि किसी भी औद्योगिक परियोजना के लाभ और संभावित जोखिमों का आकलन स्थानीय आबादी के हितों को ध्यान में रखकर किया जाएगा या नहीं। बिजली उत्पादन और औद्योगिक विकास अपनी जगह महत्वपूर्ण विषय हैं, लेकिन उनके साथ पर्यावरणीय सुरक्षा, जनस्वास्थ्य, स्थानीय संसाधनों और ग्रामीणों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।जनचौपाल में इसी व्यापक दृष्टिकोण के साथ ग्रामीणों के बीच चर्चा हुई। कांग्रेस नेताओं ने परियोजना से जुड़े सवालों को गांवों तक ले जाने और स्थानीय लोगों की चिंताओं को सामने लाने पर जोर दिया। ग्रामीणों की भागीदारी ने इस विमर्श को और महत्वपूर्ण बनाया। विशेषकर महिलाओं की मौजूदगी ने यह रेखांकित किया कि परियोजना को लेकर उठ रहे सवाल केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि परिवार, खेती, पानी और आने वाली पीढ़ियों के जीवन से भी जुड़े हैं।
गोदरी, सरई, दादर और पनगड़ी के लोगों की सहभागिता
ग्राम रोझौही में आयोजित इस जनचौपाल में गोदरी से कांग्रेसजन, हनुमान पटेल, राजबहोर पटेल तथा सरई, दादर, पनगड़ी सहित आसपास के क्षेत्रों के स्थानीय लोगों ने सहभागिता की। कार्यक्रम में ब्लॉक कांग्रेस कमेटी लालगांव के अध्यक्ष वीरेंद्र पटेल, किसान कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री अनुराग सिंह, अमहा सरपंच एवं जनपद गंगेव सरपंच संघ के अध्यक्ष मृगेंद्र सिंह, जिला पंचायत सदस्य मृत्युंजय मिश्रा, बसेड़ा सरपंच के.पी. सिंह तथा लालगांव मंडलम अध्यक्ष बी.पी. सिंह सहित अनेक कांग्रेसजन मौजूद रहे।वरिष्ठ कांग्रेस नेता गिरीस सिंह की ग्रामीणों के बीच मौजूदगी और सीधे संवाद की इस पहल को आंदोलन के जनसंपर्क विस्तार के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस नेताओं का प्रयास है कि प्रस्तावित परियोजना को लेकर गांवों में मौजूद सवालों और आशंकाओं को व्यापक स्तर पर सामने लाया जाए, ताकि विकास से संबंधित किसी भी निर्णय में स्थानीय जनता की भूमिका और हितों को उचित महत्व मिल सके।
सातवें दिन भी आंदोलन जारी, अब गांवों की आवाज बन रहा आंदोलन
कांग्रेस का जनआंदोलन सातवें दिन भी जारी रहा। आंदोलन के दौरान आयोजित जनचौपाल ने यह संकेत दिया कि रोझौही परियोजना को लेकर विरोध और विमर्श अब केवल धरना स्थल तक सीमित नहीं है। आसपास के गांवों में भी इस विषय पर चर्चा और जनसंपर्क का सिलसिला आगे बढ़ रहा है।परमाणु परियोजना जैसे संवेदनशील विषय पर स्थानीय जनता की आशंकाओं का समाधान पारदर्शी जानकारी, वैज्ञानिक तथ्यों, पर्यावरणीय मूल्यांकन और प्रभावित लोगों की सार्थक सहभागिता से ही संभव है। ग्रामसभा की भूमिका, स्थानीय सहमति और जनसुरक्षा जैसे सवाल भी इस पूरे विवाद के महत्वपूर्ण पहलू हैं।रोझौही की जनचौपाल ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि विकास की योजनाओं में उस समाज की आवाज कितनी महत्वपूर्ण है, जिसके बीच ऐसी परियोजनाएं प्रस्तावित की जाती हैं। आखिरकार किसी भी क्षेत्र का विकास वहां के लोगों की खुशहाली, सुरक्षा और विश्वास से ही मापा जाना चाहिए।रोझौही में जारी यह संघर्ष अब केवल एक प्रस्तावित संयंत्र के समर्थन या विरोध की बहस नहीं रह गया है, बल्कि यह स्थानीय जनता की भागीदारी, अपने संसाधनों पर अधिकार और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से जुड़े सवालों का विमर्श बनता जा रहा है।
