देवभूमि का अप्रकट धाम: नीलकंठ की तलहटी में स्थित ‘झिलमिल गुफा’ और मौनी शिव की शाश्वत साधना

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हरिद्वार/ उत्तराखंड के कण-कण में देवाधिदेव महादेव का वास माना जाता है, किंतु तीर्थाटन के मुख्य मानचित्र से कोसों दूर कुछ ऐसे गुप्त स्थान आज भी जीवित हैं, जिनकी आध्यात्मिक तरंगें केवल मौन, एकांत और आत्मबोध के धनी साधकों को ही स्पर्श करती हैं। ऐसा ही एक अप्रकाशित, अलौकिक और अत्यंत शांत स्थल है—ऋषिकेश-पौड़ी गढ़वाल की सीमा पर मणिकूट पर्वत की सघन घाटी में स्थित झिलमिल गुफा एवं झिलमिल महादेव।

भौगोलिक स्थिति एवं रहस्यमयी पृष्ठभूमि

यह स्थान प्रसिद्ध नीलकंठ महादेव मंदिर से लगभग 4 से 5 किलोमीटर भीतर, घने बांज और बुरांश के आरक्षित वन क्षेत्र के बीच स्थित है। यहाँ तक पहुँचने के लिए न तो कोई पक्की सड़क है और न ही कोई व्यावसायिक हलचल। पथरीली पगडंडी और मौन घाटियों से गुजरते हुए जब साधक इस प्राकृतिक गुहा तक पहुँचता है, तो वहाँ की हवा में भी ओंकार की सहज प्रतिध्वनि महसूस होती है।

यहाँ क्या पूजा जाता है?

गुफा के भीतर कोई तराशी हुई या कृत्रिम प्रतिमा स्थापित नहीं है। यहाँ पूजा जाता है:

अंगूठाकार स्वयंभू पाषाण लिंग: गुफा की छत से निरंतर टपकती जल की बूंदों के ठीक नीचे शिलाखंड पर उभरा एक सूक्ष्म, प्राकृतिक शिवलिंग।

सदा प्रज्वलित ‘अखंड धूना’: यह धूना किसी सामान्य पूजा का प्रतीक नहीं, बल्कि अनादि काल से चली आ रही नाथ संप्रदाय और गिरी संन्यासियों की योग-साधना की जीवित अग्नि है।

यहाँ क्यों पूजा जाता है और क्या है इसका आध्यात्मिक कारण?

विषपान के उपरांत शांत स्वरूप की साधना: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के कालकूट विष को कंठ में धारण करने के बाद भगवान शिव ने जब मणिकूट पर्वत पर विश्राम किया, तब दाह को शांत करने के लिए उन्होंने इसी निर्जन गुफा में समाधिस्थ होकर ‘परब्रह्म स्वरूप’ का ध्यान किया था। यहाँ शिव रौद्र रूप में नहीं, बल्कि ‘शाश्वत विश्रांति और मौन चेतना’ के रूप में पूजे जाते हैं।

मौन का अभिषेक: यहाँ मंत्रोच्चार या लाउडस्पीकर का कोई शोर नहीं होता। यहाँ की सबसे बड़ी पूजा ‘मौन’ मानी जाती है। मान्यता है कि यहाँ बैठकर किया गया 10 मिनट का प्राणायाम या नाम-जप कई महीनों की तपस्या के समान फलदायी होता है, क्योंकि यह स्थान बाह्य जगत के कोलाहल से पूरी तरह कटा हुआ है।

अदृश्य सिद्धों की तपोभूमि: स्थानीय वनवासी और यहाँ रहने वाले विरक्त संतों की मान्यता है कि यह गुफा सूक्ष्म शरीरी सिद्ध संतों की साधना स्थली है, जो आज भी गुप्त रूप से ब्रह्ममुहूर्त में यहाँ महादेव की वंदना करते हैं।

शाश्वत शिव की अनुभूति

समाचार माध्यमों और मुख्यधारा के पर्यटन से अछूता यह स्थल बताता है कि शिव किसी स्वर्ण शिखर वाले मंदिर के मोहताज नहीं हैं; वे तो प्रकृति के मौन, कंदराओं के अंधकार और साधक के अंतस में घटित होने वाली अनुभूति का नाम हैं।

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