रीवा में प्रस्तावित टाटा न्यूक्लियर पावर प्लांट पर राष्ट्रीय वेबीनार, विशेषज्ञों ने जताए गंभीर खतरे
रीवा, 10 मई 2026 (स्पेशल ब्यूरो रिपोर्ट)।
मध्यप्रदेश के रीवा जिले के सिरमौर क्षेत्र अंतर्गत रोझौही में प्रस्तावित लगभग 28 हजार करोड़ रुपये की टाटा न्यूक्लियर पावर परियोजना को लेकर रविवार को आयोजित राष्ट्रीय वेबीनार में देशभर के पर्यावरणविदों, आरटीआई कार्यकर्ताओं और परमाणु विरोधी विशेषज्ञों ने गंभीर चिंताएं व्यक्त कीं। “फ्रॉम पावर टू पेरिल: अंडरस्टैंडिंग न्यूक्लियर रिस्क्स” विषय पर आयोजित इस वेबीनार का संयोजन सामाजिक एवं आरटीआई कार्यकर्ता शिवानंद द्विवेदी ने किया।
वेबीनार में तमिलनाडु के प्रसिद्ध परमाणु विरोधी आंदोलनकारी एवं पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी के नेता सुब्रमण्यम उदयकुमार ने कहा कि भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में परमाणु ऊर्जा सुरक्षित विकल्प नहीं हो सकती। उन्होंने कुडनकुलम परमाणु संयंत्र विरोध आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि परमाणु दुर्घटनाओं का प्रभाव कई पीढ़ियों तक बना रहता है। उन्होंने रूस की चेरनोबिल और जापान की फुकुशिमा दाइची परमाणु आपदाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि आज भी वहां विकिरण का असर पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
उदयकुमार ने कहा कि सरकारें परमाणु ऊर्जा को विकास का प्रतीक बताती हैं, लेकिन इसके दीर्घकालिक खतरों को नजरअंदाज किया जाता है। उन्होंने परमाणु ऊर्जा के बजाय सौर, पवन और अन्य हरित ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।
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गुजरात के पर्यावरणविद महेश पांड्या ने परमाणु परियोजनाओं में पारदर्शिता की कमी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगने पर राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर सूचनाएं छिपाई जाती हैं। उन्होंने पूछा कि यदि परियोजनाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं तो सरकार जनता को वास्तविक तथ्य बताने से क्यों बचती है। पर्यावरणविद रजनी दवे ने कहा कि रेडियोधर्मी कचरा हजारों वर्षों तक खतरनाक बना रहता है और इससे कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ता है।
उत्तराखंड के आरटीआई रिसोर्स पर्सन प्रो. वीरेंद्र कुमार ठक्कर ने परमाणु ऊर्जा अधिनियम 2025 और सूचना प्रकटीकरण से जुड़े कानूनी पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि जनता को यह जानने का अधिकार है कि किसी भी परियोजना का उनके जीवन और पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने स्वतंत्र परमाणु सूचना आयुक्त नियुक्त करने की मांग भी उठाई।
फोरम फॉर फास्ट जस्टिस के संयोजक प्रवीण पटेल ने कहा कि बड़ी परियोजनाओं का सबसे अधिक असर गरीब, किसान और आदिवासी समुदायों पर पड़ता है। उन्होंने आशंका जताई कि रीवा में प्रस्तावित परियोजना से जल स्रोत, खेती और स्थानीय पर्यावरण प्रभावित हो सकते हैं। वहीं छत्तीसगढ़ के आरटीआई एक्टिविस्ट देवेंद्र अग्रवाल ने कहा कि देश की ऊर्जा जरूरतें महत्वपूर्ण हैं, लेकिन परमाणु संयंत्रों के लिए स्थल चयन पूरी तरह वैज्ञानिक और पारदर्शी होना चाहिए।
वेबीनार में वक्ताओं ने कहा कि देश की कुल ऊर्जा में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी केवल 3 से 4 प्रतिशत है, इसके बावजूद सरकार निजी कंपनियों के माध्यम से बड़े स्तर पर न्यूक्लियर परियोजनाओं को बढ़ावा दे रही है। वक्ताओं ने भोपाल गैस त्रासदी का उल्लेख करते हुए कहा कि औद्योगिक आपदाओं के दुष्परिणाम दशकों तक समाज को भुगतने पड़ते हैं।
बैठक के अंत में गांव-गांव जनजागरूकता अभियान चलाने, संयुक्त ज्ञापन तैयार करने और रीवा में बड़े आंदोलन की रणनीति बनाने पर सहमति बनी। संयोजक शिवानंद द्विवेदी ने कहा कि यदि जनता की चिंताओं को अनदेखा किया गया तो आने वाले दिनों में व्यापक जनआंदोलन किया जाएगा।
