जनता के गुस्से के आगे झुकी सरकार, स्मार्ट प्रीपेड मीटर पर यूपी सरकार का यू-टर्न

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जनहित से ज्यादा ‘स्मार्ट सिस्टम’ पर भरोसा पड़ा भारी, विरोध बढ़ा तो सरकार ने बदला फैसला

नई दिल्ली/लखनऊ, 5 मई।
उत्तर प्रदेश सरकार को आखिरकार स्मार्ट प्रीपेड मीटर व्यवस्था पर पीछे हटना पड़ा। जिस योजना को बिजली व्यवस्था में सुधार और पारदर्शिता का बड़ा मॉडल बताकर लागू किया जा रहा था । लेकिन लगातार जनता के गुस्से और विरोध के बाद सरकार को फ़ैसला वापस लेना पड़ा।

ऊर्जा मंत्री ए के शर्मा ने “उपभोक्ता देवो भव्” उपभोक्ता को राहत देने के लिए यह घोषणा की कि प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर व्यवस्था समाप्त कर दी गई है और अब सभी स्मार्ट मीटर पोस्टपेड मोड पर ही संचालित होंगे। यानी उपभोक्ता अब पहले की तरह बिल आने के बाद भुगतान करेंगे।

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सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब प्रदेशभर में उपभोक्ता स्मार्ट प्रीपेड मीटर को लेकर नाराज चल रहे थे। लोगों की शिकायत थी कि मीटरों में गलत रीडिंग, अपेक्षा से अधिक बिल, बैलेंस खत्म होते ही बिजली कटौती और तकनीकी खामियां आम बात बन गई थीं। कई जगह विरोध प्रदर्शन भी हुए और विपक्ष को सरकार पर हमला बोलने का मुद्दा मिल गया।

विडंबना यह रही कि जिस योजना को “स्मार्ट” बताकर लागू किया गया, वही आम उपभोक्ताओं के लिए परेशानी का कारण बन गई। जनता सवाल पूछ रही थी कि बिजली सुविधा देने के नाम पर क्या उपभोक्ताओं को रिचार्ज मॉडल पर निर्भर करना ही सुधार है?

यह पूरा घटनाक्रम सरकार को सीधा संदेश देता है कि नीतियां जनता की सुविधा के लिए बननी चाहिए, न कि केवल कागजों और प्रेजेंटेशन में आधुनिक दिखने के लिए। जनहित से जुड़े फैसलों में जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करना अंततः सरकार को बैकफुट पर ला सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले सरकार को उसकी प्रक्रिया, लाभ-हानि और तकनीकी पक्ष की स्पष्ट जानकारी जनता तक पहुंचानी चाहिए। यदि संवाद की कमी होगी, तो अच्छी मंशा वाली योजनाएं भी जनविरोध का कारण बन सकती हैं।

हालांकि बड़ा सवाल अब भी बाकी है—इस पूरी प्रक्रिया में जिन उपभोक्ताओं को गलत बिलिंग, अतिरिक्त भुगतान, मानसिक तनाव या तकनीकी नुकसान झेलना पड़ा, क्या उन्हें कोई राहत मिलेगी? इस संबंध में सरकार की ओर से अब तक कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की गई है।

फिलहाल इतना तय है कि स्मार्ट मीटर पर सरकार का यह यू-टर्न सिर्फ तकनीकी फैसला नहीं, बल्कि जनता के दबाव के सामने नीति बदलने की मजबूरी भी माना जा रहा है।

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