नारनौल पुलिस पिटाई प्रकरण —जब नागरिक आवाज़ उठाता है तो कानून भी जवाब मांगता है

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जयपुर । सरदारशहर/नारनौल। लोकतंत्र में कानून का राज केवल किताबों तक सीमित नहीं रहता—जब कोई जागरूक नागरिक अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है तो वही कानून व्यवस्था को आईना भी दिखाता है। हरियाणा के नारनौल (नीरपुर) में 28 अप्रैल 2025 की रात होटल कर्मचारी मोहन भंडारी के साथ कथित पुलिस पिटाई का मामला इसी सच्चाई की मिसाल बनकर सामने आया है। आरोप है कि कुछ पुलिसकर्मी उसे होटल से उठाकर थाने ले गए और वहां मारपीट की। अक्सर ऐसे मामले थाने की चारदीवारी में ही दब जाते हैं, लेकिन इस बार मामला दबा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा। 

सरदारशहर (चूरू) निवासी सम्पत सिंह राजपुरोहित ने इस घटना को केवल एक व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं, बल्कि मानव अधिकारों का प्रश्न मानते हुए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, नई दिल्ली तक शिकायत पहुंचाई। 03 मई 2025 को आयोग में दर्ज शिकायत पर केस नंबर 623/7/13/2025 के तहत संज्ञान लिया गया और हरियाणा पुलिस को जांच के निर्देश दिए गए।

आयोग के निर्देशों के बाद पुलिस अधीक्षक महेन्द्रगढ़ कार्यालय ने पूरे मामले की विधिवत जांच करवाई। उप पुलिस अधीक्षक मुख्यालय नारनौल ने पीड़ित के बयान, प्रत्यक्षदर्शियों के कथन और मेडिकल रिपोर्ट (BHT व एक्स-रे) सहित सभी साक्ष्यों को एकत्रित किया। जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115(2), 127(2) और 3(5) के तहत चालान  न्यायालय में पेश कर दिया गया।

यह मामला केवल एक शिकायत या एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर तीखा सवाल भी है, जो कभी-कभी वर्दी के अहंकार में इंसानियत को भूल जाती है। जिस पुलिस को जनता की सुरक्षा का प्रहरी माना जाता है, यदि वही कानून की सीमाएं लांघने लगे तो लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है। नारनौल प्रकरण ने यह भी साबित कर दिया कि मानव अधिकार केवल भाषणों का विषय नहीं हैं—यदि कोई जागरूक नागरिक आवाज़ उठाए तो व्यवस्था को जवाब देना ही पड़ता है।

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सम्पत सिंह राजपुरोहित की पहल इस पूरे मामले में जनविश्वास की एक मजबूत मिसाल बनकर उभरी है। उनका स्पष्ट संदेश है कि अन्याय के सामने चुप रहना भी अन्याय को बढ़ावा देना है। लोकतंत्र में कानून की ताकत तभी दिखती है जब आम नागरिक अपने अधिकारों को समझे और उनके लिए खड़ा हो। नारनौल की यह घटना एक चेतावनी भी है और उम्मीद भी—चेतावनी उन लोगों के लिए जो सत्ता या वर्दी के बल पर कानून से ऊपर समझने लगते हैं, और उम्मीद उन नागरिकों के लिए जो जानते हैं कि सच और अधिकार की लड़ाई अंततः न्याय की दहलीज तक पहुंचती ही है।

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