निकाय चुनाव:15 अप्रैल की डेडलाइन के बीच सुप्रीम कोर्ट पहुँची राजस्थान सरकार, संयम लोढ़ा ने दायर की कैविएट”

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जयपुर। राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकायों के चुनाव को लेकर सियासत और कानूनी जंग फिर तेज हो गई है। अदालतों द्वारा तय की गई 15 अप्रैल की समय सीमा के बावजूद अभी तक राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव कार्यक्रम जारी नहीं किया है, जिससे चुनाव को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इस बीच राजस्थान सरकार ने 113 शहरी निकायों में चुनाव टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, वहीं इस मुद्दे को अदालत तक ले जाने वाले पूर्व विधायक ने भी सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर कर सरकार के कदम का विरोध जताया है।


हाईकोर्ट से शुरू हुआ मामला

दरअसल, पिछले वर्ष कई नगर निकायों और पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी चुनाव नहीं कराए जाने पर मामला अदालत पहुंचा था। सुनवाई के दौरान ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि परिसीमन प्रक्रिया पूरी कर 15 अप्रैल 2026 तक हर हाल में चुनाव कराए जाएं।

बाद में मामला तक भी पहुंचा, जहां सर्वोच्च अदालत ने भी इस समय सीमा को बरकरार रखा और चुनाव कराने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का संकेत दिया।


113 निकायों पर नया विवाद

इस बीच चुनाव प्रक्रिया के बीच एक नया कानूनी पेच सामने आया।
बताया जा रहा है कि 113 शहरी निकायों में वार्ड परिसीमन की प्रक्रिया को अदालत ने त्रुटिपूर्ण मानते हुए निरस्त कर दिया, जिसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन देकर इन निकायों के चुनाव फिलहाल टालने के लिए अतिरिक्त समय मांगा है।

सरकार का तर्क है कि परिसीमन और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं को दोबारा पूरा किए बिना चुनाव कराना संभव नहीं होगा।


संयम लोढ़ा का आरोप

इस मामले को अदालत तक ले जाने वाले पूर्व विधायक ने सरकार के कदम का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल की है।
लोढ़ा का आरोप है कि राज्य सरकार परिसीमन, पुनर्गठन और ओबीसी आयोग की रिपोर्ट जैसे कारणों का हवाला देकर चुनाव टालना चाहती है।

उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के चुनाव को प्रशासनिक कारणों के नाम पर अनिश्चितकाल तक टालना संविधान की भावना के विपरीत है, इसलिए अदालत के आदेशों की पालना करते हुए तय समय सीमा के भीतर चुनाव कराए जाने चाहिए।


चुनाव कार्यक्रम पर सबकी नजर

अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले फैसले पर टिकी हैं। यदि अदालत सरकार को अतिरिक्त समय देती है तो कई निकायों के चुनाव आगे खिसक सकते हैं। वहीं अगर अदालत पूर्व आदेश को बरकरार रखती है तो राज्य निर्वाचन आयोग को जल्द ही चुनाव कार्यक्रम घोषित करना पड़ सकता है।


सिस्टम पर सवाल

लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी मानी जाने वाली स्थानीय निकाय संस्थाएं पिछले लंबे समय से चुनाव का इंतजार कर रही हैं। अदालतें समय सीमा तय कर चुकी हैं, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक उलझनों के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या स्थानीय लोकतंत्र फिर फाइलों और बहानों के जाल में उलझ कर रह जाएगा?


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