मूंग की MSP पर 100% खरीद पर सरकार से आर-पार के मूड में किसान

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नर्मदापुरम से राजधानी की ओर बढ़े किसान, पुलिस ने रोका रास्ता; ई-टोकन और खाद की व्यवस्था पर भी उठे सवाल

भोपाल/नर्मदापुरम। (मीडिया) मध्य प्रदेश में किसानों की नाराजगी अब राजधानी भोपाल की सड़कों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। मूंग की फसल की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर 100 प्रतिशत सरकारी खरीद, ई-टोकन व्यवस्था में सुधार और किसानों को उचित दर पर पर्याप्त खाद-उर्वरक उपलब्ध कराने जैसी मांगों को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के बैनर तले किसानों ने भोपाल की ओर कूच किया।

नर्मदापुरम से शुरू हुआ किसानों का यह मार्च सरकार के लिए महज एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि कृषि व्यवस्था को लेकर उठ रहे गंभीर सवालों का संकेत माना जा रहा है। किसानों का कहना है कि जब सरकार MSP की व्यवस्था घोषित करती है, तो फिर उनकी पूरी उपज की खरीद सुनिश्चित करना भी सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

27 जुलाई से शुरू हुआ ‘चलो भोपाल’ आंदोलन

जानकारी और मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, किसानों ने 27 जुलाई 2026 को नर्मदापुरम के सेठानी घाट से भोपाल की ओर मार्च शुरू किया। किसानों का उद्देश्य अपनी मांगों को लेकर राजधानी पहुंचना और सरकार के सामने अपनी बात रखना था।

आंदोलन के दौरान किसानों ने मूंग की पूरी उपज MSP पर खरीदने की मांग को प्रमुखता से उठाया। इसके साथ ही ई-टोकन व्यवस्था को लेकर किसानों की परेशानियों और खाद की उपलब्धता एवं वितरण व्यवस्था में सुधार की मांग भी सामने रखी गई।

पुलिस बैरिकेडिंग के बीच आगे बढ़ने की कोशिश

किसानों के भोपाल कूच को देखते हुए पुलिस और प्रशासन ने कई स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई तथा मार्गों पर बैरिकेडिंग की। किसानों के मार्च को रोकने के लिए पुलिस अधिकारियों ने किसान नेताओं से बातचीत का प्रयास किया।

कुछ स्थानों पर किसानों और पुलिस के बीच तनाव की स्थिति बनी तथा प्रदर्शनकारी किसानों ने आगे बढ़ने के लिए बैरिकेडिंग पार करने अथवा हटाने का प्रयास किया। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना अधिक उचित है कि किसानों के भोपाल की ओर बढ़ने के दौरान पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की, जबकि यह दावा कि उन्होंने पूरी तरह भोपाल सीमा में प्रवेश कर बैरिकेड तोड़ दिए और पुलिस ने बाद में रास्ता खोल दिया—इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

किसानों का सवाल—MSP सिर्फ घोषणा है या गारंटी भी?

इस आंदोलन का सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसान को उसकी उपज का MSP नहीं मिलता, तो सरकारी खरीद व्यवस्था का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है?

मूंग उत्पादक किसानों की मांग है कि उनकी उपज की 100 प्रतिशत खरीद MSP पर सुनिश्चित की जाए, ताकि उन्हें मजबूरी में कम कीमत पर अपनी फसल बेचने के लिए विवश न होना पड़े।

किसानों का कहना है कि खेती में बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ रही है। ऐसे में यदि तैयार फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता तो किसान की पूरी आर्थिक गणित बिगड़ जाती है।

ई-टोकन और खाद व्यवस्था भी बनी परेशानी

किसानों ने ई-टोकन व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि खरीद प्रक्रिया में तकनीकी और प्रशासनिक जटिलताओं के कारण कई किसान अपनी उपज बेचने से वंचित रह जाते हैं।

इसके अलावा खाद-उर्वरक की उपलब्धता और वितरण व्यवस्था को लेकर भी किसानों में असंतोष है। किसानों की मांग है कि खाद समय पर और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराई जाए, ताकि उन्हें बाजार में अधिक कीमत चुकाने या लंबी कतारों में परेशान होने की स्थिति का सामना न करना पड़े।

सरकार के सामने अब सबसे बड़ा सवाल

किसानों का भोपाल की ओर बढ़ना मध्य प्रदेश सरकार के सामने एक सीधा सवाल खड़ा करता है—

अगर किसान की फसल MSP पर खरीदने की व्यवस्था है, तो फिर 100 प्रतिशत खरीद की मांग क्यों उठ रही है?

अगर ई-टोकन व्यवस्था किसानों के हित में है, तो किसान उसमें सुधार की मांग क्यों कर रहे हैं?

अगर खाद पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, तो किसानों को वितरण व्यवस्था पर सवाल क्यों उठाने पड़ रहे हैं?

सरकार के सामने अब चुनौती केवल आंदोलन को नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि किसानों की शिकायतों का स्थायी और भरोसेमंद समाधान देने की है।

किसानों को रोककर सड़क खाली कराई जा सकती है, लेकिन उनकी समस्याओं को नजरअंदाज कर आंदोलन की वजह खत्म नहीं की जा सकती। सरकार को चाहिए कि वह किसान प्रतिनिधियों के साथ खुले संवाद की पहल करे और MSP पर मूंग की खरीद, ई-टोकन व्यवस्था तथा खाद वितरण से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट निर्णय सामने रखे।

क्योंकि सवाल सिर्फ एक आंदोलन का नहीं है—सवाल उस किसान का है, जो खेत में फसल उगाने के बाद भी अपनी मेहनत की सही कीमत के लिए राजधानी की सड़क तक पहुंचने को मजबूर हो रहा है।

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