पार्षदों के ऊंचे ख्वाबों के बीच जनता की खामोशी
अजमेर। नगर निगम चुनाव का मतदान समाप्त हो चुका है। ईवीएम में प्रत्याशियों की किस्मत बंद है और 14 सितंबर को परिणाम सामने आएगा। लेकिन परिणाम से पहले ही अजमेर भाजपा के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—क्या पार्टी का संगठन वास्तव में जमीन पर उतना मजबूत है, जितना मंचों, रैलियों और राजनीतिक दावों में दिखाई देता है?
इस सवाल के केंद्र में वार्ड 12 और वार्ड 78 विशेष रूप से चर्चा में हैं। वार्ड 12 में शहर भाजपा अध्यक्ष रमेश सोनी की पत्नी रंजना सोनी मैदान में थीं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस वार्ड में 2,654 मतदाता हैं। वहीं वार्ड 78 में भाजपा महिला संगठन की जिला अध्यक्ष भारती श्रीवास्तव चुनाव मैदान में थीं। यहां संगठनात्मक प्रभाव के साथ सामाजिक समीकरणों की भी परीक्षा थी। दोनों जगह पार्टी से जुड़े प्रभावशाली चेहरों की प्रतिष्ठा दांव पर थी, इसलिए इन वार्डों का चुनाव केवल प्रत्याशियों की व्यक्तिगत लड़ाई नहीं, बल्कि संगठन की पहुंच और प्रभाव का भी परीक्षण माना जा सकता है।
अजमेर नगर निगम में अंतिम मतदान प्रतिशत 63.65 प्रतिशत रहा। कुल 4,38,039 मतदाताओं में से 2,78,804 मतदाताओं ने मतदान किया। यह आंकड़ा 11 सितंबर को शाम 6 बजे मतदान समाप्त होने के बाद का है। मतदान के दौरान दोपहर 3 बजे तक अजमेर में 48.48 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ था, लेकिन अंतिम घंटों में मतदान प्रतिशत तेजी से बढ़ा और 63.65 प्रतिशत पर पहुंच गया।
यह आंकड़ा अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसलिए भाजपा के लिए सवाल केवल यह नहीं कि अजमेर में कुल मतदान कितना हुआ, बल्कि यह भी है कि पार्टी के प्रभाव वाले वार्डों में बूथवार मतदान कैसा रहा और उसके संगठन ने अपने समर्थक मतदाताओं को मतदान केंद्र तक कितनी मजबूती से पहुंचाया। यही आंकड़े अब संगठन की वास्तविक जमीनी ताकत का बेहतर आकलन कर सकते हैं।
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क्योंकि चुनावी राजनीति में रैली की भीड़ और मतदान की भीड़ एक नहीं होती। गाड़ियों के काफिले, डीजे, झंडे और सोशल मीडिया का शक्ति प्रदर्शन माहौल जरूर बनाता है, लेकिन वोट डालने के लिए मतदाता को अपने घर से निकलना पड़ता है। यदि मजबूत माने जाने वाले क्षेत्रों में भी अपेक्षित मतदान नहीं हुआ, तो इसे केवल मतदाता की उदासीनता कहकर आगे बढ़ जाना संगठन के लिए आसान रास्ता हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह सही आत्ममंथन हो।
यहीं भाजपा की कार्यशैली पर सवाल खड़ा होता है। जनता से जुड़े रहने वाला नेतृत्व यदि काले शीशों वाली गाड़ियों के लवाजमे में दिखाई देगा, तो आम मतदाता उस तक पहुंचेगा कैसे? राजनीति में नेता और जनता के बीच दूरी जितनी बढ़ेगी, संगठन की जमीनी पकड़ पर सवाल उतना ही बड़ा होगा। भाजपा की ताकत उसका कार्यकर्ता और बूथ संगठन माना जाता है; इसलिए पार्टी को यह भी देखना होगा कि उसका कार्यकर्ता आज भी उतनी ही मजबूती से जनता के बीच खड़ा है या चुनाव आते ही सक्रिय होने वाला तंत्र बनकर रह गया है।
परिणाम के बाद भाजपा को केवल जीते और हारे प्रत्याशियों की सूची नहीं बनानी चाहिए। 80 वार्डों की बूथवार पोस्ट-पोल समीक्षा होनी चाहिए—कहां मतदान कम रहा, कहां कार्यकर्ता सक्रिय था, कहां पुराने कार्यकर्ता नाराज थे, कहां टिकट को लेकर असंतोष था, कहां बागी उम्मीदवार खड़े हुए और कहां सामाजिक समीकरण पार्टी के पक्ष या विपक्ष में गए। इन सवालों का जवाब किसी एक व्यक्ति को कठघरे में खड़ा करके नहीं मिलेगा। संगठन को अपनी कार्यशैली, संवाद व्यवस्था और स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता पर भी नजर डालनी होगी।
जिला अध्यक्षों सहित सभी जिम्मेदार पदाधिकारियों के काम का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उनके साथ कितने नेता दिखाई दिए, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि कितने कार्यकर्ता जुड़े और कितने मतदाता संगठन के साथ खड़े हुए।
चुनाव के दौरान एक दूसरी तस्वीर भी दिखाई दी—प्रत्याशी और समर्थक मतदान से पहले ही पार्षदों की संख्या, बोर्ड के समीकरण और मेयर की कुर्सी का गणित लगाने लगे। लेकिन जनता का गणित इससे अलग है। उसके सवाल सड़क, पानी, सफाई, नाली, रोशनी और चुनाव के बाद उपलब्ध रहने वाले जनप्रतिनिधि से जुड़े हैं।
नेताओं के सपने कुर्सी से शुरू होते हैं, जनता के सवाल घर से।
यदि 14 सितंबर को भाजपा नगर निगम में अपेक्षित बहुमत हासिल नहीं कर पाती है तो हार का कारण केवल प्रत्याशियों के खाते में डाल देना संगठन के लिए आत्ममंथन से बचने जैसा होगा। पार्टी को यह भी देखना होगा कि क्या स्थानीय नेतृत्व जनता से दूर हुआ, क्या कार्यकर्ता को पर्याप्त सम्मान और भूमिका मिली, क्या टिकट चयन में स्थानीय राय सुनी गई और क्या जिला स्तर का नेतृत्व पूरे संगठन को साथ लेकर चल पाया।
वार्ड 12 और वार्ड 78 इसलिए भाजपा के लिए केवल दो चुनावी वार्ड नहीं हैं, बल्कि दो राजनीतिक आईने हैं। इन आईनों में प्रत्याशी से ज्यादा संगठन का चेहरा दिखाई देगा। 14 सितंबर को ईवीएम जनता का फैसला सुनाएगी, लेकिन उसके बाद भाजपा को अपना फैसला खुद करना होगा—क्या वह राजनीति को काफिलों और पदों तक सीमित रखेगी या कार्यकर्ता और आम मतदाता के बीच वापस जाएगी?
क्योंकि मजबूत संगठन वह नहीं जिसके पास सबसे लंबा काफिला हो। मजबूत संगठन वह है जिसके कार्यकर्ता को जनता पहचानती हो, जिसकी बात जनता सुनती हो और जिसके नेता तक आम आदमी बिना दूरी के पहुंच सके।
अजमेर भाजपा के सामने चुनौती केवल पार्षदों की संख्या बढ़ाने की नहीं है। चुनौती जनता का भरोसा और संगठन की जमीनी पकड़ मजबूत करने की है।
वरना पार्षदों के ऊंचे ख्वाब, मेयर की कुर्सी की गणित और गाड़ियों के लंबे काफिलों के बीच कहीं ऐसा न हो कि जनता का भरोसा पीछे छूट जाए और राजनीतिक कारवां आगे निकल जाए।
