6 दिसंबर की याद: कोटा के कारसेवकों की भूमिका, लिब्रहान आयोग में राजस्थान का जिक्र और उस दिन की गूँज

Spread the love

कोटा/अयोध्या, 6 दिसंबर।
आज बाबरी मस्जिद ढांचा गिराए जाने की घटना को 32 साल पूरे हो गए। इस दिन को देशभर में विभिन्न संगठन अलग-अलग रूपों में याद करते हैं—कुछ इसे ‘शौर्य दिवस’ तो कुछ ‘काला दिवस’ के रूप में मनाते हैं। 1992 की उस बहुचर्चित घटना में राजस्थान, विशेषकर कोटा जिले के कई कारसेवकों की सक्रिय भूमिका दर्ज की गई थी, जिनका उल्लेख बाद के वर्षों में हुई जांच और रिपोर्टों में सामने आता रहा। 6 दिसंबर 1992 उस दिन को याद दिलाता है जब देशभर से हजारों लोग अयोध्या पहुँचे थे। इस भीड़ में राजस्थान के कोटा जिले से आए कारसेवक भी बड़ी संख्या में शामिल थे। हाड़ौती क्षेत्र के ये कारसेवक अपनी आस्था, जोश और अनुशासन के लिए अलग पहचान रखते थे।

स्थानीय लोगों के अनुसार, कोटा से गए कई युवा उस समय राम मंदिर आंदोलन के प्रति बेहद समर्पित थे और शांतिपूर्वक लेकिन दृढ़ भाव से अयोध्या पहुँचे। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि वे सबसे संगठित समूहों में से एक थे—न तो अव्यवस्था फैलाने का इरादा और न किसी को भड़काने का रवैया। कहा जाता है कि कोटा के कारसेवक यात्रा के दौरान अनुशासन, सहयोग और साहस का उदाहरण बने। यही वजह थी कि कई लोग आज भी उनके समर्पण की मिसाल देते हैं।

घटना के बाद केंद्र सरकार ने लिब्रहान आयोग बनाया, जिसने 17 साल की जांच के बाद 2009 में रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में कहा गया कि ढांचा गिराने की घटना में देशभर से बड़े पैमाने पर भीड़ शामिल थी। आयोग ने राजस्थान से आए कारसेवकों की उपस्थिति का उल्लेख तो किया, लेकिन किसी खास व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कई राज्यों से पहुंचे लोग आंदोलन के प्रति अपनी भावनाओं के कारण अयोध्या गए थे, जिनमें राजस्थान का योगदान उल्लेखनीय रहा।

आज 6 दिसंबर को कोटा सहित कई स्थानों पर इस दिन को अलग-अलग तरीकों से याद किया गया। कुछ संगठनों ने इसे शौर्य दिवस के रूप में मनाया, जबकि कई सामाजिक समूहों ने इसे शांति और सद्भाव की अपील के साथ याद किया। कई लोगों ने कहा कि चाहे घटना कैसी भी रही हो, कोटा से गए कारसेवकों का समर्पण, साहस और आस्था आज भी याद की जाती है।

कोटा के बुजुर्ग बताते हैं कि 1992 की वह यात्रा उनके जीवन की बड़ी यादों में शामिल है। युवा पीढ़ी भी आज अपने परिवार के ­किस्सों से उस समय के माहौल को जानती है—एक ऐसा दौर जब लोग अपने विश्वास के लिए लंबी यात्राएँ तय करते थे।

6 दिसंबर का दिन आज भी देश को इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना की याद दिलाता है और यह भी समझाता है कि समाज में शांति, एकता और आपसी सम्मान सबसे ऊपर है।

“ज्योतिष मार्गदर्शन” वाणी गुरु जी से जाने अपनी कुंडली की चाल स्वयं सीखें कुंडली देखना ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *